पश्चिमी गणित पद्धति और वैदिक ज्योतिष (Western Mathematic System and Vaidic Astrology)
इन दिनों ज्योतिषशास्त्र में गणना के लिए पश्चमी गणित का प्रयोग खूब हो रहा है(Nowadays in Astrology western mathematics system is becoming popular)। इस पद्धति के प्रचलन का प्रमुख कारण है कि इसमें लग्न साधन करना आसान होता है और परिणाम भी बेहतर मिलता है।
इस पद्धति में साम्पत्तिक काल एवं अयनांश का प्रयोग करने से लग्न का सही ज्ञान मिलता है (In Western mathematic system employing sidereal time and Ayanmansh we get accurate Ascendant)। ज्योतिषशास्त्री ज्योतिष गणना के लिए पश्चिमी गणित को बहुत ही अच्छा और उपयुक्त मानते हैं। फिर भी पश्चिमी गणित पद्वति में बहुत सी ऎसी बातें हैं जो तर्क सम्मत होने पर भी व्यवहारिक दृष्टि से फलित ज्योतिष के अनुकूल नहीं बैठती है। यहां इन्हीं तथ्यों की विवेचना करते हुए हम पश्चिमी गणित और फलित ज्योतिष की बात करते हैं।
भाव साधना (Bhava Sadhan):
आजकल अधिकांश ज्योतिषी दशम लग्न साधन करते है, तथा उसी के आधार पर अन्य भावो की सन्धि या मध्य भाग को स्पष्ट करते हैं। इस पद्वति में कोइ भाव 40 अंश तक चला जाता है तथा कोइ-कोइ भाव 20 अंश तक ही रह जाता है। जबकि भारतीय ज्योतिषशास्त्रो एंव सहिंताओ में प्रत्येक भाव का मान 30 अंश माना गया है। प्रत्येक भाव का मान 30 अंश मान कर चलने की परम्परा पराशर, भृगु, जैमिनी आदि प्राचीन ऋषियो की रही है (The tradition of assuming the value of each house as 30 degree is introduced by such ancient seers as Prasar, Vrighu or Jaimini) । इस पद्धति से गणना करने से भावो के मान यानी अंशादि में अंतर रहता है।
कहा जाय कि गणित की दृष्टि से पश्चिमी पद्धति सही और आसान होने के कारण तेजी से अपना जाय रहा है परंतु फलित ज्योतिष की दृष्टि से पश्चिमी गणित भारतीय ज्योतिष से हाथ मिलाने की योग्यता नहीं रखता है तो ग़लत नहीं होगा। फलित ज्योतिष की महत्ता को पश्चमी देशों ने भी अच्छी तरह पहचाना है यही कारण है कि आज पश्चिमी देशों में भी भारतीय वैदिक ज्योतिष को हाथों हाथ लिया जा रहा है। वैदिक ज्योतिष के प्रसार की प्रमाणिका इससे अधिक क्या हो सकती है कि प्रत्येक वर्ष हज़ारों की तायदाद में विदेशी पर्यटक भारत आते है और ज्योतिष एवं अध्यात्म का अध्ययन कर रहे हैं।
सायन पद्धति (Sayan System):
ज्योतिषशास्त्रियो को मालूम होगा कि इन दिनों अयनांश 24 अंशों के निकट है , इसका तात्पर्य है कि सायन सूर्य-निरयण से लगभग 24 अंश आगे रहता है। ज्योतिषशास्त्र के नियमानुसार जब सूर्य एंव चन्द्रमा एक ही राशि यानी अंश पर होते हैं तो अमावस्या तिथि होती है और सूर्य व चन्द्रमा में 180º अंशो का अन्तर आ जाने पर पूर्णिमा तिथि कहलाती है (When sun and moon are in a single sign or degree its called new moon or when there is a difference of 180 degree that is called Full moon)। इस स्थिति में सूर्य व चन्द्रमा एक-दूसरे के सामने रहते है। यहाँ पर यदि हम सायन सूर्य को गणना में ले तो अमावस्या व पूर्णिमा के अंशो में 24अंशों का अन्तर आ जायेगा यह पश्चिमी गणित के सिद्धान्त के विपरीत होगा। इस स्थिति में सायन सूर्य की प्रासांगिकता फलित ज्योतिष के लिए कुछ भी नहीं रहती है।
निष्कर्ष के तौर पर कहें तो भारतीय ज्योतिषशास्त्रियों को वैदिक ज्योतिष की परम्परा का पालन करते हुए नये-नये शोघ करते रहना चाहिए एवं वैदिक ज्योतिष की श्रेष्ठता को और भी प्रमाणिक रूप से प्रस्तुत करने में योगदान देना चाहिए। पश्चिमी गणित में भी अच्छी चीज़ें हैं अगर उनको भी आप अपनाते हैं तो इसमें कोई बुराई नहीं है। पश्चिमी गणित पद्धति में साम्पत्तिक काल को अपनाया जा सकता है।
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