कृष्णमूर्ति पद्धति में सूक्ष्म से अति सूक्ष्म का सफर (Know the Sub Sub System of Krishnamoorthy)
ज्योतिषशास्त्र गणनाओं पर आधारित विज्ञान है (Astrolgy is a science, and it is based on mathematical calculation)। इस गणना में फलादेश की निश्चितता तक पहुंचने के लिए जितनी ही छोटी ईकाइ का चुनाव मात्रक के रूप में किया जाता है परिणाम उतना ही सटीक और वास्तविक होता है।
प्राचीन ज्योतिष विधा में राशियों को मात्रक के रूप में चुना गया। राशियों को 9 भागों में विभाजित कर 30 डिग्री के अंश पर गणना का विधान रहा, इस विधा को नवमांश के रूप जाना गया।नवमांश विधा ज्योतिषशास्त्रियों में काफी लोकप्रिय रहा फिर भी वैदिक ज्योतिष की गूढ़ता को कम करने और नये पीढ़ी के ज्योतिषों के लिए इसे आसान और सरल बनाने हेतु शोध कार्य चलते रहे। श्री कृष्णमूर्ति महोदय ने अपने शोध से गणना की ईकाइ का मात्रक कम करने हेतु राशि की जगह नक्षत्रों का चुनाव किया और इन्हे विंशोत्तरी दशा के आधार पर 9 असमान भागों में विभाजित किया। और नवमांश की जगह कालांश को जन्म दिया।
कई बार हमें विशेष स्थिति का पता करना होता है कि अमुक समय में अमुक कार्य सिद्ध होगा अथवा नहीं। एक निश्चित अवधि में इच्छित कार्य के विषय में जब फल ज्ञात करना होता है तब गणना के लिए अति सूक्ष्म मात्रक की आवश्यकता होती है। यही कारण रहा है कि वैदिक ज्योतिष के नाड़ी ज्योतिष में प्रत्येक राशि को 150 अंशों में बाँटा गया है, यह विभाजन असमान होता है ( In Vedic Nadi Jyotish, signs are divided into unequal 150 sub parts)। विभाजित अंशों को नाड़ीआंश के नाम से जाना जाता है (Divided parts are known as Nadiansh)। इस विभाजन में सबसे छोटा अंश 0 डिग्री, 1 मिनट 40 सेकेंन्ड के लिए होता है और सबसे बड़ा 0 डिग्री 30 सेकेन्ड का होता है। इन अंशों के दो भाग किये गये हैं पूर्व भाग्य और उत्तर भाग्य, गणना में अधिकांशत: एक ही अंश के दोनों भागो में अलग अलग परिणाम मिलता है।
नाड़ीआंश की तरह ही कृष्णमूर्ति पद्धति में सूक्ष्म से अति अति सूक्ष्म यानी (Sub-Sub) विभाजन कि भी सुविधा है। इस सूक्ष्म अति सूक्ष्म विघि से अगर आप फलादेश की जांच करें तो अत्यंत प्रमाणिक और निश्चित फल ज्ञात कर सकते हैं। इस विधि का उपयोग ज्योतिर्विद कृष्णमूर्ति ने तो स्वयं कम किया परंतु उनके बाद के ज्योतिषास्त्रियों ने इसे हाथों हाथ लिया और बहुत तेजी से इसका विस्तार होता जा रहा है। इस विधा के प्रयोग के विषय में यह सुझाव दिया जाता है कि इसका प्रयोग विशेष स्थिति में करना चाहिए जब आपको किसी खास प्रश्न या विषय के सम्बन्ध में फल जानना हो। इन दिनों इस पद्धति की इस विशेषता के कारण इसका प्रयोग प्रश्न ज्योतिष में काफी बड़े पैमाने पर हो रहा है (Krishnamurthy's sub sub system is popular in Prashna Kundli)। ज्योतिष की इस विधा के विषय में कहा गया है कि जब जातक का जन्म समय निश्चित तौर पर पता हो तभी इसका प्रयोग करना चाहिए अन्यथा फलादेश सही नहीं प्राप्त होगा।
अब तक आप कृष्णमूर्ति पद्धति में कालांश के अति अति सूक्ष्म विभाजन के गुण और विशेषताओं के बारे काफी कुछ जान गये होंगे। आइये अब देखें कि कृष्णमूर्ति ने किस प्रकार कालांश का अति सूक्ष्म विभाजन किया और इस विभाजन का सिद्धांत क्या है। कृष्णमूर्ति ने नक्षत्रों के 13 डिग्री 20 अंश को 9 भागों में विंशोत्तरी दशा के आधार पर विभक्त किया और कालांश या उप का निर्माण किया। इनके निर्माण के बाद इन्होंने इनका एक स्वामी बनाया जिसे कालांशस्वामी या उपस्वामी नाम दिया। नक्षत्रों के विभाजन के समान ही इन्होंने कालांश का भी विभाजन किया और नाम दिया उप उप (Sub-Sub) और इसके स्वामी को उप उप स्वामी (Sub-Sub lord) का नाम दिया।
उप उप क्षेत्र (Sub Sub area) ज्ञात करने के लिए इन्होंने जिस गणितिय विधि को तैयार किया है वह इस प्रकार है। इसमें विंशोत्तरी दशा के 120 वर्ष से जिस ग्रह को विंशोत्तरी दशा में जितना वर्ष प्राप्त हुआ है उसमें भाग दिया जाता और उससे कालांश को गुणा किया जाता है इससे उप उप का क्षेत्र ज्ञात किया जाता है। और सभी उप क्षेत्र का स्वामी कोई ग्रह होता है जिसे उप उप स्वामी के नाम से संबोधित किया जाता है। इसे समझने के लिए आप गणितिय विधि को देख सकते हैं।
ग्रहों के लिए आवंटित वर्ष
उप क्षेत्र x -------------------------------------- = उप उप क्षेत्र
120
इस पद्धति में पहला उप क्षेत्र वही होता है जो कालांश का मान होता है। इस विधि से प्राप्त उप उप का मान बहुत ही कम होता है अर्थात सबसे छोटा 2 मिनट और सबसे बड़ा 22.2 मिनट।
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