अन्धराती कुण्डली (Andhrati Kundli In Lal Kitab)
अन्धराती कुण्डली (Andhrati Kundli) केवल दो ग्रहो के कारण बनती है. इसमें सूर्य व शनि का महत्वपूर्ण योगदान होता है अर्थात जब कुण्डली के चतुर्थ भाव में सूर्य (Sun In Fourth House) और सप्तम भाव में शनि (Saturn In Seventh House) हो तो वह कुण्डली अन्धराती कहलाती है अथवा इसे आधी अन्धी कुण्डली (Andhi Kundli) भी माना जाता है.
अन्धराती कुण्डली (Andhrati Kundli) केवल दो ग्रहो के कारण बनती है. इसमें सूर्य व शनि का महत्वपूर्ण योगदान होता है अर्थात जब कुण्डली के चतुर्थ भाव में सूर्य (Sun In Fourth House) और सप्तम भाव में शनि (Saturn In Seventh House) हो तो वह कुण्डली अन्धराती कहलाती है अथवा इसे आधी अन्धी कुण्डली (Andhi Kundli) भी माना जाता है.
सूर्य आत्मबल (Atmabal) का कारक होता है तथा चन्द्रमा मनोबल (Manobal) का कारक माना जाता है. चतुर्थ भाव चन्द्रमा का पक्का है इस भाव में स्थित सूर्य पर शनि की दशम दृष्टि (Tenth Aspect Of Saturn) पड रही है, इस प्रकार सूर्य और दशम भाव दोनो शनि के द्वारा पीडित हो रहे हैं. इस स्थिति में मनुष्य (व्यक्ति) को पारिवारिक, व्यवसायिक एंव सामाजिक क्षेत्र में परेशानियों का सामना करना पड्ता है. यद्यपि व्यक्ति में योग्यता की कमी नही होती.
अन्धराती कुण्डली से पीडित व्यक्ति को शनि के कुप्रभाव से बचने के लिए इसका उपाय (Remedy for Saturn) करना चाहिये. यदि जन्मकुण्डली के प्रथम भाव में कोइ ग्रह हो तो बाँस की काली बंसरी में देसी खांड या चीनी भर कर किसी सुनसान जगह पर दबाने से शनि ग्रह के दुष्प्रभाव में शान्ति होगी. और यदि प्रथम भाव में कोई भी ग्रह न हो अर्थात प्रथम भाव रिक्त हो तो मिट्टी के कुल्हड् में शहद भर कर विरानी जगह में दबाने से व्यक्ति को शुभ फलो की प्राप्ति होती है. पारिवारिक जीवन सुखी, समाज में यश एंव व्यवसायिक उन्नति होती है. मानसिक शान्ति मिलती एंव आत्मबल में भी वृद्धि होती है.
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