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लाल किताब में ग्रहो की दृष्टियाँ (Aspects of Planets in Lal-Kitab)

image लाल किताब में ग्रहो की दृष्टियाँ

वैदिक ज्योतिष में दृ्ष्टियो के सम्बन्ध में अपना एक अलग सिद्धान्त है. यहाँ पर दृष्टि ग्रह की होती है भाव की नहीं. दूसरे पूर्ण दृष्टि ही मान्य है आधी-अधूरी नही. वैदिक ज्योतिष के एक अन्य सिद्धान्त में नैसर्गिक ग्रहो की मित्रता एंव शत्रुता स्थायी होती है तथा एक-दूसरे पर दृष्टि का आधार भी नैसर्गिक होता है. परन्तु लाल किताब अपने विशेष सिद्धान्त पर कार्य करती है.

लाल किताब के सिद्वांत:

1) यहाँ दृष्टि भावों की होती है ग्रहो की नही. भाव विशेष में ग्रह के होने से ग्रह को भाव की दृष्टि मिलती है. उदाहरण के लिए प्रथम भाव सप्तम भाव को पुर्ण दृ्ष्टि (100%) से देखता है, तो यदि कोइ भी ग्रह लग्न भाव मे़ आ जाये तो वह भी सप्तम भाव को पुर्ण दृ्ष्टि से देखेगा. परन्तु उस ग्रह के अन्य भाव में जाने पर यह नियम लागू नही होगा.

2) लाल किताब के आधार पर भाव की पुर्ण (100%), आधी (50%) एंव चौथाई दृ्ष्टि होती है(25%)

3) वैदिक ज्योतिष के विपरीत लाल किताब में नैसर्गिक ग्रहो की मित्रता एंव शत्रुता अस्थाई होती है. उदाहरण के लिए सुर्य एंव शनि में नैसर्गिक शत्रुता है. लाल किताब की कुण्डली में सुर्य प्रथम भाव तथा शनि नवम भाव में स्थित है. चूंकि शनि, सुर्य से नवम भाव में स्थित है तो शनि सुर्य की बुनियाद है अतः यहाँ पर शनि, सुर्य से मित्रता का भाव रखते हुए उसकी भरपूर मदद करेगा. अब हम यहाँ दूसरा उदाहरण लेते हैं. सुर्य एंव मंगल आपस में नैसर्गिक मित्र हैं. लाल किताब की कुण्डली मे सुर्य पंचम भाव तथा मंगल दशम भाव में स्थित है. तो इस स्थिति में मंगल अपनी आँठवी टकराव की दृ्ष्टि से सुर्य को हानि पहुचायेगा.

इस बात से सिद्ध होता है कि लाल किताब में ग्रहो की नैसर्गिक मित्रता एंव शत्रुता का कोइ अर्थ नही है क्योकि भावो की दृष्टि या दो या दो से अधिक ग्रहो के मध्य बनने वाली दृष्टियो के फलस्वरुप विभिन्न ग्रहो के आपसी सम्बन्धो में परिवर्तन आ जायेगा.

वैदिक ज्योतिष से लाल किताब का एक और अन्तर स्पष्ट होता है. वैदिक ज्योतिष के सिद्धान्त में प्रत्येक ग्रह की सप्तम दृष्टि होती है. मान लो सुर्य तृ्तीय भाव में स्थित होकर नवम भाव में स्थित चन्द्रमा को देख रहा है तो नवम भाव का चन्द्रमा भी तृ्तीयस्थ सुर्य को सप्तम दृष्टि से देखेगा अर्थात सुर्य व चन्द्र दोनो ग्रहो की एक दूसरे पर दृष्टि होगी. परन्तु लाल किताब में एसा नहीं है. तृ्तीय भाव का सुर्य नवम भावस्थ चन्द्रमा को देखता है परन्तु चन्द्रमा सुर्य को नही देखेगा. लाल किताब में परस्पर दृष्टि सम्बन्ध नही होता तथा ना ही भाव की विपरीत दृष्टि होती है. इस प्रकार आप लाल किताब को बहुत अच्छी प्रकार समझ सकते हैं.

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