लाल किताब के सिद्धान्त एंव नियम (Principles And Laws Of Lal Kitab)
ज्योतिष के क्षेत्र में वैदिक ज्योतिष को प्राचीनतम एंव प्रामाणिक (Pramanik) माना जाता है. क्योकि अधिकतर ज्योतिर्वेद एंव ज्योतिष के विद्यार्थी/ जिज्ञासु वैदिक ज्योतिष का ही अनुसरण करते हैं तथा लाल किताब के मूल सिद्धान्त (Mula Sidhhanta Of Lal Kitab) भी वैदिक ज्योतिष से ही लिये गये है अतः लाल किताब को पूर्ण रुप से समझने के लिए हम यहाँ ज्योतिष की इन दोनो शाखाओ की समानात्मक (Samanatmak) एंव तुलनात्मक आधार (Comparative Base) पर विवेचना करेंगे. एक ही समय पर दोनो का एक साथ विश्लेषण करने से एक तो ज्ञान की गहराई तक पहुँच पायेंगे दूसरा भ्रम की स्थिति भी नही रहेगी.
सबसे पहले हम यह जानना चाहेंगे कि लाल किताब क्या है? तथा यह किस सिद्धान्त के आधार पर कार्य करती है. लाल किताब में सामुद्रिक (Samudrik) (हस्त रेखा) को ज्योतिष का आधार माना गया है. चूंकि लाल किताब केवल फलित का ग्रन्थ है इसलिए इसका गणित पक्ष (Ganit Pakhya) वैदिक ज्योतिष से लिया गया है. अतः हम कह सकते हैं कि लाल किताब सामुद्रिक (हस्त रेखा) + वैदिक ज्योतिष + स्वंय के कुछ नियमो को मिलाने से बनी है. आइये अब हम जानें कि लाल किताब में जन्म्कुण्डली का निर्माण किस प्रकार होता है. वैदिक ज्योतिष के अनुसार पारम्परिक कुण्डली (Paramparik Kundali) बनाने के लिए तीन चीजो की आवश्यकता पडती है:-
- 1) जन्म तारीख (Birth Date)
- 2) जन्म समय (Birth Time)
- 3) जन्म स्थान (Birth Place)
कुण्डली के निर्माण में ये तीन तत्व जिम्मेदार होते हैं. समय के परिवर्तन से लग्नराशी (Lagna Rashi) में परिवर्तन हो जाता है. लाल किताब में कुण्डली का निर्माण पहले तो वैदिक ज्योतिष के आधार पर होता है तत्पश्चात लग्न भाव (Lagna Bhav) में मेश राशी को स्थिर रखते हुए वैदिक कुण्डली के भावों में स्थिर ग्रहो को उन्ही भावो में रखा जाता है. क्योकि लाल किताब में भावों में राशियाँ चलायमान न होकर स्थिर रहती है अतः इस सिद्धान्त के आधार पर लाल किताब की कुण्डली में प्रत्येक लग्न मेष राशी से ही प्रारम्भ होता है.
इस प्रकार यहाँ जन्म समय एंव जन्म स्थान के सिद्धान्त को तिलान्जली दी गई है. इस नियम से प्रत्येक ग्रह की भाव राशी (Bhav RashI) में परिवर्तन हो जाता है. जैसे कि वैदिक ज्योतिष से बनी कुण्डली के चतुर्थ भाव में गुरू ग्रह चाहे किसी भी राशी में हो परन्तु लाल किताब की कुण्डली के चतुर्थ भाव में गुरु कर्क राशी में ही आयेगा. उदाहरण के लिए सबसे पहले वैदिक ज्योतिष के आधार पर लग्न ज्ञात करें उसके बाद नौ ग्रहो को भाव राशी में बैठाऎं फिर उसे लाल किताब की कुण्डली में परिवर्तित करने के लिए सभी ग्रहो को उन्ही भावों में रहने दें तथा प्रत्येक भाव के नम्बर (Number Of Bhav) मिटाकर लग्न में मेष राशी (1) चतुर्थ भाव में कर्क( Cancer In 4th House) (4) राशी मानकर सभी भावो में राशीया (नम्बर) (Number Of Rashi) लिख दें अब यह लाल किताब द्वारा बनी कुण्डली (Kundali Made By Lal Kitab) होगी.
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