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लाल किताब में ग्रहो के वक्रत्व की अवहेलना (Negligence Of Retrogression Of Planets In Lal Kitab)
वैदिक ज्योतिष में वक्री ग्रहो (Retrograde Planets In Vedic Jyotish) का महत्वपुर्ण रोल होता है. जब सुर्य एंव ग्रह विशेष में निश्चित अंशो की दूरी होती है तब ग्रह वक्री (Retrogression Of Planets) कहलाता है. कुछ ज्योतिर्वेदो के अनुसार ग्रह वक्री होने पर और अधिक बलवान हो जाता है अर्थात शुभग्रह वक्री होने (Retrogression Of Auspicious Planets) पर शुभ बलशाली एंव क्रुर ग्रह वक्री (Retrogression Of Inauspicious Planets) होने पर अशुभ बलशाली हो जाता है. ग्रह अपने वक्रत्व काल (Bakratwa Kal) में विशेष फल देता है.
सामाजिक, राजनैतिक, आर्थिक स्थिति में बडा परिवर्तन वक्री ग्रहो के समय में ही होता है. एक प्रकार से पुरा उथल-पुथल का दौर चलता है. कुछ अन्य ज्योतिर्वेदो के अनुसार ग्रहो के वक्रत्व का शुभाशुभ प्रभाव जन्मकुण्डली के अनुसार होता है, इसमे शुभग्रह व पापी ग्रहो का पहले वाला सिद्धान्त मान्य नही है. वैदिक ज्योतिष के सिद्धान्त (Vedic Sidhanta) के अनुसार लग्नेश (Lord Of Ascendant) चाहे वह शुभ ग्रह हो या क्रुर वक्री अवस्था में कमजोर हो जाता है.
कुछ ज्योतिर्वेदो का मानना है कि शुभ या बलवान स्थिति में ग्रह के वक्री होने पर वह अशुभ, तथा अशुभ या कमजोर स्थिति में ग्रह के वक्री होने पर वह शुभ फलदायी हो जाता है, एक नियम निश्चित है कि ग्रह(वक्री) चाहे अनुकूल हो या प्रतिकूल परन्तु प्रभावशाली होकर फल प्रदान करता है. राहु-केतु सदैव वक्री (Retrogression Of Rahu & Ketu) रहते है. यहां एक प्रश्न उठता है कि ग्रह वक्री होने पर प्रभावशाली क्यों हो जाता है. इसका कारण है ग्रह की पृथ्वी से निकटता अर्थात वक्री अवस्था में ग्रह पृथ्वी के निकट भ्रमण करता है.
लाल किताब में ग्रह के वक्रत्व (Retrogression Of Planets In Lal Kitab) की उपेक्षा की गई है. और वैसे भी लाल लिताब के रचनाकार ने अपने विश्वास के अनुसार वैदिक सिद्धान्तो का समावेश लाल किताब में किया है. जैसे कि ग्रहो की अवस्था को भी पूर्णतः नजर-अन्दाज किया गया है. स्पष्ट रुप से यदि हम कहें तो लाल किताब के स्वंय के बनाऎ हुए सिद्धान्त है तथा इन सिद्धान्तो का प्राचीन शास्त्रीय पद्वति से कोइ मेल नहीं है, लाल किताब को नये जमाने का शास्त्र माना जाता है.
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