भूत वर्ग विचार (Bhoot varg)
दुनियां में जितने भी रिश्ते हैं उनमें सबसे नाजुक रिश्ता पति पत्नी का रिश्ता होता है। इस रिश्ते में अगर जरा सी चूक हो जाए तो जीवन एक एक पल बिताना कठिन हो जाता है, यही कारण है कि इस नाजुक रिश्ते की गांठ में बंधने से पहले बहुत अधिक जांच परख की जाती है। आपने देखा होगा कि जब आपके घर में किसी की शादी की बात चलती है तब आपके घर के प्रमुख लोग जाकर देखते हैं कि जिस लड़के अथवा लड़की से शादी की बात चल रही है उनका स्वभाव कैसा है, क्या उन दोनों की जोड़ी सही रहेगी, क्या वे एक दूसरे के योग्य हैं, फिर जाकर शादी की बात आगे बढ़ती है। इतना सब कुछ जांच परख करने के बाद भी कई बार ऐसा देखने में आता है कि पति पत्नी के बीच मनमुटाव है और दोनों अलग हो रहे हैं।
ज्योतिषशास्त्री मानते हैं कि आमतौर पर इस तरह की घटना इसलिए होती है क्योंकि हम बाहरी तौर पर गुणों का आंकलन (Assessment of Characterstic) करते हैं और कुण्डली में स्थित ग्रहों(Stages of Planets) के गुणों को नज़र अंदाज़ कर जाते हैं। आप चाहते हैं कि आपका वैवाहिक जीवन प्रेमपूर्ण और सुखमय हो तो इसके लिए विवाह पूर्व कुण्डली मिलान (Kundli Matching) जरूर करलें। कुण्डली मिलान के लिए आप उत्तर भारतीय पद्धति (Method of North Indians) का चयन कर सकते हैं या चाहें तो दक्षिण भारतीय पद्धति(South Indians method) को अपना सकते हैं अगर आप दोनों से आंकलन करना चाहते हैं तो यह भी कर सकते हैं। उत्तर भारतीय पद्धति के आठ वर्ग से आंकलन(Assessment of North Indians from 8 Varg)(Assessmet of South indians methods from 20 koot) करने के पश्चात आप अगर दक्षिण भारत के 20 कूटों से आंकलन करना चाहें तो इसके अन्तर्गत भूतवर्ग से भी विचार करलें तो अच्छा रहेगा।
भूतवर्ग से किस तरह कुण्डली मिलायी (Kundli Matching from Bhoot Koot) जाती है तथा इससे कैसे फलादेश देखा जाता है आइये इसे समझते हैं। ज्योतिष ग्रंथ (Astrological Granth) प्रश्न मार्ग के अनुसार 27 नक्षत्रों को पंच महाभूतों में बॉटा(Division of 27 nakshatras in Five Muhurats) गया है। सबसे पहले महाभूतों का नाम जान लेते हैं, ये पंच भूत हैं क्रमश: 1. पृथ्वी तत्व (prithvi Tatv) 2. जल तत्व (Jal Tatv);3.अग्नि तत्व (Agni Tatv) 4.वायु तत्व(Vayu Tatv) और 5. आकाश तत्व (Akash Tatav)। भूतवर्ग में नक्षत्रों को क्रमश: 5, 6,5,6,5 के क्रम में रखा गया है, इस प्रकार देखें तो पृथ्वी तत्व के हिस्से में पांच नक्षत्र आते हैं अश्विनी, भरणी Bhrni), कृतिका (kritika), रोहिणी (Rohini) और मृगशिरा (Mrigshira)। जल तत्व के अन्तर्गत 6 नक्षत्र आते है आर्द्रा (Ardra), पुनर्वसु (Punrvasu), पुष्य (Pushay), आश्लेषा (Ashlesha), मघा (Mgha), पूर्वा फा.(Purva Phalguni)। अग्नि तत्व के अन्तर्गत उ. फा.(Utra Phalguni), हस्त (Hast), चित्रा (Chitra), स्वाती (Swati) और विशाखा(Vishakha) ये पांच नक्षत्र आते हैं। वायु तत्व के अन्तर्गत 6 नक्षत्र अनुराधा (Anuradha), ज्येष्ठा( jayeshtha), मूल (Mool), पूर्वाषाढ़ा (Purva Shada), उत्तराषाढ़ा (utra Shada) श्रवण (Sharvan) आते हैं और आकाश तत्व(Akash Tatv) के हिस्से में घनिष्ठा (Ghnishtha), शतभिषा (Shatbisha), पूर्वाभाद्र.(Purva Bhadr), उ. भा (Utra Bhadr). और रेवती (Raevti) ये पांच नक्षत्र आते हैं।
फलादेश की दृष्टि (Aspect of prediction) से देखा जाए तो वर और वधू दोनों का जन्म नक्षत्र एक भूतवर्ग में हो तो बहुत ही अच्छा माना जाता है, यह विवाह के श्रेष्ठ कहा जाता है। पृथ्वी तत्व सभी के साथ शुभ सम्बन्ध बनाता है अत: इसे भी अच्छा माना जाता है। अगर स्त्री- पुरूष में से कोई भी पृथ्वी तत्व का है तो विवाह किया जा सकता है। पृथ्वी तत्व के पश्चात आकाश तत्व को रखा गया है इसे सामान्य माना जाता है। मेलापक की दृष्टि से भूतवर्ग में जल और अग्नि तत्व में नक्षत्र होने पर अशुभ होता है अर्थात विवाह की इज़ाजत नहीं दी जाती है क्योंकि यह घातक होता है।
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