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दिनकूट विचार (Din koot)

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कहावत है कि शादी व्याह गुड्डे गुड़ियों का खेल नहीं है, यानी यह रंचमंच का नाटक या 3 घंटे का फिल्मी ड्रामा नहीं है। शादी व्याह जीवन भर का नाता होता है, जिसके साथ दो आत्माओं का मिलन होता है और 2 परिवारों के मध्य सम्बन्ध स्थापित होता है। विवाह के संदर्भ में यह कहा गया है कि कन्या जब युवावस्था में प्रवेश कर जाए तब उसे किसी योग्य हाथों में सौंप देना चाहिए यानी कन्या के योग्य वर की तलाश करके कन्या की शादी कर देनी चाहिए, जो माता पिता इस कर्तव्य का पालन करते हैं और कन्या दान करते हैं उन्हें बहुत ही पुण्य मिलता है।

कन्या के योग्य वर की तलाश के अन्तर्गत ही हमारे समाज में कुण्डली मिलान की प्रथा प्रचलित है। इस प्रथा के अन्तर्गत जब शादी की बात शुरू होती है तब कन्या और वर की कुण्डली मिलायी जाती है ताकि इस बात का पता चल सके कि कन्या और वर के कितने गुण कुण्डली में मिल रहे हैं। गुण मिलने से पता चलता है कि वर और कन्या के बीच ताल मेल कितना होगा, इनका पारिवारिक जीवन कैसा रहेगा, दामपत्य जीवन में धन की स्थिति कैसी रहेगी एवं अन्य प्रश्नों के साथ पति पत्नी की आयु का भी विचार किया जाता है।

कुण्डली मिलान के अन्तर्गत दक्षिण भारत में  20 कूट (20 koot) या वर्ग में एक वर्ग है दिनकूट। ज्योतिषशास्त्र (Astrology)के नियमानुसार 27 दिनों का एक नक्षत्र मास होता है, चन्द्रमा एक दिन में एक ऩक्षत्र की दूरी तय कर लेता(Moon cover a Distance of one  Constellation in one Day) है इसे एक नक्षत्र दिन या दिनकूट कहते हैं। दिनकूट से कुण्डली मिलाने (Kundli matching from Din koot)का तरीका क्या है और यह किस प्रकार से परिणाम प्रदान करता है आइये इसे दखें। इस विधि में वधू के नक्षत्र से वर के नक्षत्र तक गणना की जाती है। एक आवृत्ति 9 नक्षत्र की होती है, कुल नक्षत्र संख्या 27(Total number of Constellation are 27) होने से  9-9 नक्षत्रों की तीन आवृत्तियां होती है।

प्रत्येक आवृति में पहले से नवें नक्षत्र तक क्रमश: 1. मृत्यु 2. प्रेम 3.विपत्ति 4. सुख 5. दु:ख 6. धन वृद्धि 7. रोग 8. सन्तान 9.परस्पर मित्रता होती है।

दिनकूट से जब वर वधू की कुण्डली मिलायी जाती है तब कन्या के नक्षत्र से वर के नक्षत्र की दूरी जिस क्रम में होती है उस क्रम से मिलने वाले परिणाम के अनुरूप फलदेश (prediction)किया जाता है जैसे मान लीजिए कन्या का नक्षत्र रोहिणी है और वर का नक्षत्र पुनर्वसु है तो कन्या के नक्षत्र से गिनती करने पर वर का नक्षत्र चतुर्थ स्थान पर पड़ता है जिसका फल सुख है, यानी विवाह के पश्चात इस दम्पत्ति को सुख की प्राप्ति होगी।

कुछ ज्योतिषशास्त्रियों (Astrologer) का मत है कि वर के नक्षत्र से कन्या के नक्षत्र तक गिनकर भी दिनकूट के अन्तर्गत फलादेश किया जा सकता है। इसमें विपत व वधतारा तीनों आवृतियों में अशुभ होती है। इस कूट के फलादेश को आप इस तरह से भी समझ सकते हैं जैसे वधू नक्षत्र से वर नक्षत्र तक या वर नक्षत्र से वधू नक्षत्र तक गिनकर 9 का भाग देने से शेष सम या शून्य बचे तो शुभ फल प्राप्त होता है तथा विषम शेष बचे तो अशुभ फल प्राप्त होता है। 27 वां नक्षत्र यदि मित्र राशि में पड़ता है तो इसे अत्यंत अशुभ माना जाता है। दिनकूट के विषय में कहा गया है कि ग्रह मैत्री या योनि मैत्री होने से वर वधू को इस कूट के अशुभ फल से राहत मिलती है।

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