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जातिकूट (Jati Koot)

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विवाह के प्रसंग में कुण्डली मिलाने की प्रथा उत्तर भारत में भी प्रचलित है और दक्षिण भारत में भी (Tradition of Kundli Matching in North India and South India)। कुण्डली मिलाने की इस प्रथा में कई बातें दोनों जगह समान हैं तो कई जगह दोनों में कुछ अंतर भी है। बात करें जातिकूट की तो यह उत्तर भारत में भी मान्य है और दक्षिण में भी परंतु दोनों में कुछ विभेद है। उत्तर भारतीय जातिकूट पद्धति और दक्षिण भारतीय जातिकूट में विभेद को ही हम अपना विषय बनाकर चर्चा को आगे बढ़ाते हैं, तो आइये चर्चा शुरू करें।

ज्योतिष परम्परा में वैदिक ज्योतिष(Vedic joytish in Astrlological Tradition) ने राशियों को चार जाति वर्ग में विभाजित किया है. ब्राह्मण (Brahamn), क्षत्रिय(Shatriyas), वैश्य(Vaishayas) और शूद्र(Shudras) ये चार जाति हैं जिसके अन्तर्गत राशियों को रखा गया है. कर्क, वृश्चिक एवं मीन ये चार्ट में पहले वर्ग में आते हैं, मेष, सिंह व धनु ये द्वितीय वर्ग में आते हैं, वृष, कन्या व मकर तीसरे वर्ग में आते हैं और अंतिम व चौथे वर्ग में मिथुन, तुला व कुम्भ राशियां आती हैं. उत्तर भारतीय पद्धति के अनुसार जब वैवाहिक कुण्डली का मिलान किया जाता है तब अष्टकूट(Asht Koot) के अन्तर्गत जातिकूट से राशियों की जातियों के आधार पर ही कुण्डली का मिलाप किया जाता है.

जातिकूट के अन्तर्गत जब वर-कन्या की जन्मराशियां(Janam Rshi) एक ही वर्ग में हों तो तब बहत ही शुभ मानी जाती है. यदि चार्ट में स्त्री की जाति पुरूष की जाति से नीचे हो तो इसे सामान्य कहा जाता है. जब चार्ट में रूत्री की जन्मराशि पुरूष की जन्म राशि से ऊपर हो तो इसे अशुभ (Inauspicious) स्थिति मानी जाती है.

उपरोक्त अध्ययन से ज्ञात होता है कि उत्तर भारतीय पद्धति में राशियों को अधिक महत्व दिया गया है. यहां राशियों को आधार मानकर फलादेश(Prediction according to the Rashi)किया जाता है. इसकूट के विषय में जब हम दक्षिण भारतीय सिद्धांत (Theory of South Indians) का अध्ययन करेंगे तो पाएंगे कि उनमें नक्षत्रों को प्रधानता(Importance of Nakshatras) दी गई है. इस विषय में प्रमाण के तौर पर आप माधवीयम्(Mdhviyam is a Mythological Book) नामक ग्रंथ को ले सकते हैं, इसमें नक्षत्रों की जाति(Coomunity of Nakshatras) का उल्लेख किया गया है. दक्षिण भारत में विवाह के विषय में जब कुण्डली मिलायी जाती है तब जातिकूट मिलाप के अन्तर्गत इन्हीं नक्षत्रों की जातियों से आंकलन(Evaluation) किया जाता है.

दक्षिण भारतीय पद्धति में जातिकूट के अन्तर्गत अश्विनी(Ashvini) से रेवती(Raivti) तक 27 नक्षत्रों को चार जातियों में बाँटा (Divided 27 Nakshatras in Four casts) गया है. इनमें जातियों का विभाजन इसप्रकार किया गया है जिसमें ऊपर से चार नीचे और नीचे से चार ऊपर क्रम में हैं जैसे ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र के क्रम में आश्विन से शुरू होकर रोहिणी(Rohini) तक गिना जाता है फिर मृगशीर्ष(Mrighshirsh) से शुरू होकर पुष्य(pushay) तक गिनती की जाती है और रेवती तक इसी क्रम को पुन: दुहराया जाता है.

नक्षत्रों की जाति विभाजन में शूद्र के हिस्से में 6 नक्षत्र आते हैं बाकि अन्य तीनों जातियों के हिस्से में 7 नक्षत्र आते हैं. उत्तर भारतीय जातिकूट के समान ही दक्षिण भारत में भी फलादेश का तरीका समान होता है. यहां भी वर-वधू के नक्षत्र एक जाति में हों तो उत्तम माना जाता है. कन्या के जन्म नक्षत्र से वर का जन्म नक्षत्र ऊपर होने पर विवाह के लिए सामान्य स्थिति मानी जाती है, इसके विपरीत अगर कन्या का जन्म नक्षत्र वर के जन्म नक्षत्र से ऊपर हो तो इसे अशुभ माना जाता है.

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