रज्जुवर्ग विचार(Rajju vargh)
दक्षिण भारतीय ज्योतिष पद्धति के अनुसार जब किसी व्यक्ति की वैवाहिक कुण्डली मिलायी जाती है तब 20 कूटों(Kundli matching according to 20 Koot) से विचार किया जाता है। 20 कूटों के अन्तर्गत एक कूट आता है रज्जुवर्ग। रज्जु वर्ग से जब स्त्री-पुरूष की कुण्डली का विश्लेषण (Analysis)किया जाता है तो किस विषय में फलादेश प्राप्त होता है और इससे फलादेश प्राप्त करने का तरीका क्या है यहां हम इसी पर रोशनी डालते हैं।
दक्षिण भारतीय ज्योतिष पद्धति में रज्जुवर्ग बनाने की दो विधि(Two Method of creating Rajju vargh) है। प्रथम विधि में तीन शिवलिंग(Vishvlingh) का आकार बनाया जाता है उसके उपर चार सीधी रेखाएं खींची जाती है और इनमें व्याव्य कोण यानी पश्चिमोत्तर(PashimotrKon) कोण से शुरू करके अश्विन्यादि(Ashinaydi) सारे नक्षत्रों को प्रदक्षिणा क्रम(Prdshina kram) यानी दाई ओर स्थापित किया जाता है। कुण्डली मिलान में कन्या और वधू के जन्म नक्षत्र अगर एक रेखा या रेखाहीन स्थान पर हों तो इसे अशुभ(Auspicious) माना जाता है। इस स्थिति में वैवाहिक सम्बन्ध होने पर पति पत्नी में सामंजस्य की कमी होती है फलस्वरूप उनमें विरोधभास रहता है।
रज्जुवर्ग बनाने की पहली विधि आप जान गये अब दूसरी विधि पर आइये विचार करें। दूसरी विधि में तर्जनी(Trjni) रहित तीन उंगलियों के तीन पर्वों में क्रम व व्युत्क्रम(Vyutkram)से तीन-तीन नक्षत्र तीन बार स्थापित किया जाता है। स्त्री पुरूष के नक्षत्रों के आंकलन में नक्षत्र एक ही पर्व पर हों तो इसे अशुभ(Inasuspicious) माना जाता है। मध्य रज्जु या रेखा पर नक्षत्र हो तो इसे बहुत अधिक अशुभ की श्रेणी में रखा जाता है।
उपरोक्त विधि के अलावा अन्य विधियों से भी रज्जु का विचार किया जाता है जिनमें से एक नाम है पंच नाड़ी चक्र(Name of Five Nari) इसे पंच रज्जु के नाम से भी जाना जाता है। पंचरज्जु पॉच तरह के होते हैं 1. पादरज्ज(Padrajju) 2. उरूरज्जु (Ururajju) 3.नाभिरज्जु (Nabhirajju) 4.कण्ठरज्जु(Kanthrajju) और शिरोरज्जु(Shirorajju)
पंच रज्जु में सभी रज्जु का अपना अपना प्रभाव होता है। ज्योतिष के अनुसार अगर दम्पत्ति के नक्षत्र पादरज्जु में हों तो स्त्री को विरह (Nostlagia) सहना पड़ता है यानी पति परदेश में रहता है। अगर नक्षत्र मिलान में स्त्री और पुरूष के नक्षत्र उरूरज्जु में हों तो धन की हानि(Financialy Problem in Ururajju) होती है। अगर दोनों के नक्षत्र नाभिरज्जु में हों तो संतान के सम्बन्ध में प्रतिकूल प्रभाव(Asverse Effect) का सामना करना पड़ता है। कण्ठरज्जु कन्या के लिए घातक होता है(Distructive Effect of Kanthrajju for kanya) अर्थात कण्ठरज्जु में अगर वर वधू दोनों के नक्षत्र मौजूद हों तो विवाह के पश्चात पत्नी के जीवन पर संकट होता है इसी प्रकार अगर दोनों के नक्षत्र शिरोरज्जु में हों तो पति के जीवन पर खतरा होता है।
पंचरज्जु में शुभ स्थिति(Auspicious stage in Panchrajju) तब मानी जाती है जबकि वर वधू के नक्षत्रों के आंकलन में दोनों के नक्षत्र अलग अलग रज्जु में हों, ऐसा होने से वैवाहिक जीवन सुखद होता है। इस चक्र में अगर वर का नक्षत्र आरोह क्रम(Aroh Kram) में हो तथा कन्या का नक्षत्र अवरोह क्रम(Avroh kram) में हो तो दोनों ही आयुष्मान(Ayushman)होते हैं अर्थात लम्बे समय तक दाम्पत्य जीवन का आनन्द प्राप्त करते हैं।
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