योगिनी कूट (Yogini Koot)
हमारे देश में ज्योतिष परम्परा के अनुसार जब स्त्री और पुरूष की शादी की बात चलती है तब सबसे पहले दोनों की कुण्डली मिलायी जाती है। कुण्डली मिलाने से ज्ञात होता है कि वर और वधू की कुण्डली में ग्रह, नक्षत्र एवं राशियों में किस तरह का सम्बन्ध बन रहा है। ग्रह नक्षत्र एवं राशियो के मध्य सम्बन्ध का विश्लेषण इसलिए किया जाता है क्योंकि ज्योतिष शास्त्र का मानना है कि ग्रह, नक्षत्र एवं राशियों के बीच जैसा सम्बन्ध होता है वैसा ही प्रभाव हमारे जीवन पर होता है (Astrology says Relation between Planets, Nakshatra and Rashi are very important in astrology, the type of relation between them, decide the type of effect on our life) यानी इनके बीच मित्रता पूर्ण सम्बन्ध है तो आपके बीच भी प्रेमपूर्ण सम्बन्ध रहता है और अगर इनमें दुश्मनी है तो आपके गृहस्थ जीवन में विवाद और कलह होता रहता है।
आज जीवन यूं भी काफी तनाव और संघर्षपूर्ण हो गया है इस स्थिति में पारिवारिक जीवन में यूं ही बहुत से उतार चढ़ाव आते रहते हैं, इस स्थिति में अगर कुण्डली मिलान किये बिना अथवा सही प्रकार से कुण्डली मिलाये बगैर शादी की जाए तो हो सकता है कि ग्रह, नक्षत्र एवं राशियां प्रतिकूल स्थिति पैदा करे और पारिवारिक जीवन कलह से भर जाए। इन स्थितियों मे आज के समय में कुण्डली मिलान के पश्चात ही शादी की जाए तो अधिक अच्छा माना जाता है।
भारत में कुण्डली मिलान की मुख्य दो पद्धति है अष्टकूट और बीसकूट(There are two type of kundli matching system in India those are Ashtkoota and Beeskoota)। अष्टकूट पद्धति उत्तर भारत में प्रचलित है और 20 कूट दक्षिण भारत में मान्य है (Asht koota system is famous in North India and 20 koota is famous in South India)। अष्टकूट के अन्तर्गत आठ प्रकार के वर्ग या कूट होते हैं और 20 कूट में 20 प्रकार के होते हैं। योगिनी कूट जिसकी बात हम करने जा रहे हैं वह 20 कूट के अन्तर्गत आने वाला एक कूट है (Yogini koota is the part of beeskoota)। इस कूट के विषय में बात को आगे बढ़ाते हुए सबसे पहले जानते हैं कि योगिनियां कितने प्रकार की होती है।
योगिनी के प्रकार (Types of Yogini):ज्योतिष सिद्धांत के अनुसार योगिनियां आठ प्रकार की होती है (8 types of Yogniya according to the Astrology), जिनका क्रम इस प्रकार है 1.ब्रह्मणी(Brahamani) 2.कौमारी(Kaumari) 3.वाराही(Varahi) 4.वैष्णवी(Vaishnavi) 5.माहेन्द्री(Mahendri) 6. चामुण्डा(Chamunda) 7. माहेश्वरी(Maheshwari) 8.महालक्ष्मी(Mahalakshmi)।
योगिनी कूट के अन्तर्गत योगिनियों को उत्तर पूर्व दिशा के क्रम में स्थापित किया जाता है। सभी योगिनियां तीन तीन नक्षत्र की स्वामिनी मानी जाती है(Each yogini rules on three nakshatra)। जिन नक्षत्रों की जो योगिनी मालकिन हैं उन्हें उनके साथ पूर्व दिशा में चक्र के अनुसार स्थापित किया जाता है जैसे ब्राह्मणी प्रथम योगिनी है तो उनके साथ प्रथम नक्षत्र अश्विनी को रखा जाता है (Brahmini is the first yogini and Ashwani is the first Naksahtra therefore Bhahamani and Ashwani are placed in same chakara)। इसी प्रकार क्रम चलता है। नक्षत्रों की कुल संख्या 27 हैं अत: आठों योगिनियों के साथ तीन तीन नक्षत्र स्थापित करने से 3 नक्षत्र पूर्वाभाद्रपद, उत्तराभाद्रपद और रेवती शेष बच जाते हैं। इन तीनों नक्षत्रों को पुन: पूर्व दिशा से ब्राह्मणी, कौमारी और वारही में स्थापित किया जाता है।
योगिनियों के साथ नक्षत्रों को स्थापित करने के बाद स्त्री और पुरूष की कुण्डली में नक्षत्रों का आंकलन किया जाता है। नक्षत्रों के आंकलन से ज्ञात होता है कि स्त्री और पुरूष दोनों का जन्म समान योगिनी में हुआ है तो इसे बहुत ही शुभ माना जाता है (In Marriage muhurta bride and groom are belonging to same yogini, it is very auspicious for them)। इस स्थिति में यह माना जाता है कि अगर स्त्री और पुरूष का विवाह होता है तो इनके बीच मधुर सम्बन्ध रहेंगे और गृहस्थी खुशहाल रहेगी। स्त्री और पुरूष के जन्म नक्षत्र अगर आंकलन में अलग अलग योगिनी में आते हैं तो इसे अशुभ माना जाता है क्योंकि इस स्थिति में दाम्पत्य जीवन में कलह की संभावना रहती है।
ध्यान देने वाली बात है कि एक अन्य योगिनी कूट के अन्तर्गत जब नक्षत्रों को स्थापित किया जाता है तब आठों योगिनियों के साथ तीन तीन नक्षत्र को स्थापित करने के बाद शेष बचे तीन नक्षत्रों को वैष्णवी योगिनी में स्थापित किया जाता है। परिणाम की दृष्टि से योगिनी कूट में दोनों ही के परिणाम समान की बताये गये हैं अत: आप जिस पद्धति से चाहें फलादेश प्राप्त कर सकते हैं।
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