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अन्नप्राशन संस्कार(Ann Prashan Sanskar)
हम सभी जानते हैं कि इस शरीर रूपी मशीन को चलाने के लिए उर्जा और शक्ति की आवश्यक होती है(Energy is very essential for our Body)। उन्न और भोज्य पदार्थों से हमें उर्जा और शक्ति मिलती है। सनातन ध्रर्म के अनुसार जब बच्चों के दांत निकलने शुरू होते हैं और वह पहली बार दूध के अलावा ठोस आहार लेता है तब यह संस्कार किया जाता है, अर्थात पहली बार जब बच्चा शास्त्रोक्त तरीके से अन्न ग्रहण करता है उस संस्कार को अन्नप्राशन संस्कार के नाम से जाना जाता है।
इस संस्कार में बच्चे को ठोस आहार दिया जाता है। यह ठोस आहार खीर होती है जो ना तो पूरी तरह तरह पेय होती है और न ही खाद्य। इस खीर में शहद, घी, तुलसी पत्ता और गंगाजल मिलाया जाता है। इन सभी चीज़ो को शामिल करने का उद्देश्य यह है कि ये पौष्टिक, रोगनाशक तथा पवित्र आध्यात्मिक गुणों को बढ़ाने वाले होते हैं।
शास्त्रों में कहा गया है कि जैसा आहार होता है वैसी ही हमारी बुद्धि, हमारा स्वभाव और व्यक्तित्व होता है(As per Rituals our Mind,Character and Personality depends according to our Food)। इसलिए शुद्ध और पुष्ट आहार से अन्नप्राशन कराया जाता है। यह शुभ कर्म अर्थात संस्कार शुभ समय में हो इसके लिए मुहुर्त का विचार किया जाता है(Consideration of Muhurat for Good Work and Sanskar)। अन्नप्राशन के लिए शुभ मुहुर्त देखते समय सबसे पहले हम संस्कार का समय ज्ञात करते हैं।
संस्कार का समय(Time of Sanskar):
ज्योतिषशास्त्र के विधान के अनुसार इस संस्कार के लिए समय का आंकलन बालक और बालिका के अनुसार अलग अलग होता है(According to the Aistrology assessment of time according to Boy and Girl are different for Sanskar)। अगर संतान बालक है तो इनका अन्नप्राशन छठे, आठवें अथवा दसवें महीने में किया जाना चाहिए। अगर संतान बालिका है तो इनका अन्नप्राशन पंचम, सप्तम, नवम या एकादश मास में करना शास्त्रानुकूल माना जाता है।
नक्षत्र का आंकलन(Assessment of Nakshatras):
अन्नप्राशन के लिए शुभ मुहुर्त के रूप में रोहिणी(Rohini), उत्तराफाल्गुनी(Uttrafalguni), उत्तराषाढ़ा(Utrashada), उत्तराभाद्रपद(Utrabhadrpad), स्वाती(Swati), पुनर्वसु(Punrvasu), श्रवण(Shravan), घनिष्ठा(Ghnista), शतभिषा(Shatbhisha), मृगशिरा(Mrigshira), रेवती(Revti), चित्रा(Chitra), अनुराधा(Anuradha), हस्त(Hast), अश्विनी(Ashvini), पुष्य(Pushay) और शतभिषा(Shatbhisha) नक्षत्र का नाम लिया जाता है। जब आपको अपनी संतान का अन्नप्राशन करना हो उस समय यह देख लें कि क्या इनमें से कोई नक्षत्र विराजमान है या नहीं। उपरोक्त नक्षत्रों को छोड़कर अन्य नक्षत्र में अन्नप्राशन करना शुभ नहीं माना जाता।
तिथि विचार(Consideration of Date):
ज्योतिष विधा के अनुसार अन्नप्राशन रिक्ता(Rikta) यानी चतुर्थ, नवम व चतुर्दशी तिथि, एवं नन्दा तिथि(nanda Tithi) यानी प्रतिपदा(Pratipada), षष्टी(Shashti) एवं एकादश तिथि तथा अष्टम, द्वादश तथा अमावस को छोड़कर अन्य किसी भी तिथि यानी द्वितीया, तृतीया, पंचमी, सप्तमी, दशमी, त्रयोदशी तथा पूर्णिमा के दिन किया जा सकता है।
वार का आंकलन(Assessment of Day):
अन्नप्राशन के लिए ज्योतिषशास्त्र कहता है यह सोमवार, बुधवार, बृहस्पतिवार और शुक्रवार के दिन करना चाहिए। इस शुभ संस्कार हेतु यह उत्तम दिन माना जाता है।
लग्न का विचार(Consideration of Ascendent):
अन्नप्राशन के लिए शुभ मुहुर्त का आंकलन करते समय शुभ लग्न का भी विचार करना चाहिए(Consideration of Auspicious lagna (ascendent) for assessment of Auspicious Muhurat for annaprasana)। वृष, मिथुन, सिंह, कन्या, तुला, धनु, मकर एवं कुम्भ लग्न अन्नप्राशन संस्कार के लिए शुभ माने जाते हैं। इस शुभ कार्य हेतु प्रथम, तृतीय, पंचम, सप्तम, नवम भावों में स्थित शुभ ग्रह तथा तृतीय, षष्टम एवं एकादश भाव में स्थित पाप ग्रह का होना बहुत ही शुभ माना जाता है।
निषेध(Nishaed):
अन्नप्राशन के लिए ज्योतिषशास्त्र में बताया गया है कि जब लग्न के रूप में मेष, वृश्चिक या मीन मौजूद हो तो यह संस्कार नहीं करना चाहिए। संतान के जन्म के समय जिस राशि का लग्न था उससे आठवें राशि के लग्न में यह संस्कार नहीं करना चाहिए। मुहुर्त लग्न में चन्द्रमा प्रथम, षष्टम व अष्टम भाव में नहीं होना चाहिए, तथा दशम भाव रिक्त होना चाहिए। चन्द्र व तारा शुद्धि भी इस संस्कार के लिए आवश्यक है, अगर चन्द्र व तारा शुद्ध नहीं हैं तो स्थिति दोषपूर्ण मानी जाती है।
विशेष(Vishaesh):
इस संस्कार के अन्तर्गत एक उप संस्कार भी आता है जिसे "भूमि उपवेशन"(Bhumi Upvesan) के नाम से जाना जाता है। यह संस्कार उस समय किया जाता है जबकि शिशु पहली बार पृथ्वी पर बैठता है। इस संस्कार को जन्म से पांचवें मास में किया जाता है जब गोचर में मंगल बलवान होता है।
नक्षत्र(Nakshatras):
भूमि उपवेशन संस्कार के लिए उत्तराफाल्गुनी, उत्तराषाढ़ा, उत्तराभाद्रपद, रोहिणी, हस्त, अश्विनी, पुष्य, अभिजीत, मृगशिरा, अनुराधा और ज्येष्ठा नक्षत्र को शुभ माना गया है।
तिथि(Date):
इस संस्कार के लिए रिक्ता तिथि यानी चतुर्थ, नवम, चतुर्दशी तिथि को छोड़कर सभी तिथि शुभ मानी गयी हैAll Tithi are Auspicious except chaturthi, Navmi and Chaturdashi)। इस संस्कार में संतान की कमर में कटि सूत्र पहनाया जाता है अत: इसे कटि सूत्र संस्कार भी कहा जाता है। इसमें शिशु की कमर के चारों ओर एक धागा बांधा जाता है और वाराह भगवान (भगवान श्री हरि के अवतार ) और पृथ्वी की पूजा की जाती है। इस प्रकार इस विधि से इस संस्कार की रस्म अदा की जाती है।
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