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दाह संस्कार (Daha Sanskar)

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image दाह संस्कार (Daha Sanskar)

सोलह संस्कार वास्तव में एक चक्र है जो समय के साथ चलता रहता है(In reality 16 Sanskar is like a chakra which working according to the Time)। यह गर्भधारण से शुरू होता है और विभिन्न चरणों से गुजरते हुए शरीर के अंत के साथ समाप्त हो जाता है। हमारे शास्त्र, पुराण बताते हैं कि आत्मा अमर है यह निरन्तर एक शरीर से दूसरे शरीर में भ्रमण करता है जबतक कि आत्मा अपने परम अंश अर्थात परमात्मा को प्राप्त न कर ले। आत्मा की सदगति के लिए व्यक्ति की मृत्यु के पश्चात हिन्दू धर्म में दाह संस्कार किया जाता है।

कहा जाता है कि हमारा शरीर पंचभूतों यानी पृथ्वी, अग्नि, वायु, जल और आकाश से निर्मित है(Our body constituted of five Elements that is Earth,Agini,Air,Water and Sky)। दाह संस्कार से ये सभी तत्व अपनी जगह वापस चले जाते हैं और जीवात्मा को एक नया स्वरूप मिलता है जबकि उसे मुक्ति नहीं मिल पाती। हमारे शास्त्रों में दाह संस्कार के दो प्रकार बताए गये हैं(As per our Aistrolgy there are two types of Daha Sanskar)।

1. जब मृतक का शरीर उपस्थित हो(Presence of Dead Body)। 2.जब मृतक का शरीर मौजूद न हो (Absence of Dead Body)।

1शास्त्र के अनुसार जब मृतक का शरीर मौजूद होता है तब शरीर को दाह संस्कार के लिए किसी मुहुर्त की आवश्यकता नहीं होती(According to our Shastra, Muhurta is not required at the time of Daha Sanskar when dead body is present)। ज्योतिषशास्त्र कहता है जब चन्द्रमा कुम्भ या मीन राशि में होता है तब पंचक योग बनता है
(when moon situated in kumbh or meen rashi, then panchak yoga is crerated)। पंचक के समय जब किसी व्यक्ति की मृत्यु होती है तो मृतक को पंचक दोष लगता है (person who are dead in panchak yoga, they suffer from panchak dosha)। इस दोष के निवारण हेतु पंचक शान्ति करनी पड़ती है(requiem is the Solution of panchak dosha)। पंचक शान्ति के लिए शव के साथ ही पांच प्रतीकात्मक देह बनाकर उनका भी एक साथ संस्कार करना होता है। ऐसा करने से पंचक दोष समाप्त हो जाता है।

2.जब मृतक का शरीर उपलब्ध ना हो तो कुश, पलाश और चावल के आटे से मृत व्यक्ति के नाम से प्रतीकात्मक पुतले का दाह संस्कार किया जाता है। इस संस्कार के लिए मुहुर्त की आवश्यकता होती है।

नक्षत्र(nakshatra):
प्रतीकात्मक दाह संस्कार में मुहुर्त का विचार करते समय देखा जाता है कि नक्षत्र की स्थिति कैसी है(nakshatras position is important in Muhurta for symoblic Dah sanskar)। अगर नक्षत्र श्रवण, हस्त, स्वाती, अश्विनी या पुष्य हो तो इसके लिए उपयुक्त माना जाता है। इस संस्कार के लिए उत्तरा फाल्गुनी, उत्तराषाढ़ा, उत्तराभाद्रपद, रोहिणी, अनुराधा, पूर्वाफाल्गुनी, पुनर्वसु, विशाखा, मृगशिरा, चित्रा और घनिष्ठा मध्यम कहे गये हैं।

वार(Day):
वार के दृष्टिकोण से रविवार, सोमवार और बृहस्पतिवार प्रतिकात्मक यानी पुतला बनाकर दाह संस्कार के लिए उपयुक्त माने गये हैं(Sunday,Monday and Thursday is good for Symbolic Daha Sanskar)।

निषेध(Nisedh):
दाह संस्कार के लिए गुरू-शुक्र का अस्त काल उपयुक्त नहीं माना गया है(Setting Period of Venus is not good for Daha Sanskar)। सभी वैसे नक्षत्र, वार इसके लिए त्याज्य हैं जिनका जिक्र ऊपर नहीं किया है।  भद्रा दोष होने पर भी यह संस्कार नहीं करना चाहिए(Bhadra Dosh is not good for dah sanskar)।

दाह संस्कार के साथ ही हिन्दू धर्म के सभी सोलह संस्कार पूर्ण हो जाते हैं।
 
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