द्विपुष्कर और त्रिपुष्कर योग का प्रभाव (Effects of Dwipushkar and Tripushkar Yoga)
ज्योतिषशास्त्र के अनुसार अगर आप अपना काम शुभ मुहुर्त में करते हैं तो आपको कार्य का परिणाम कई गुणा बेहतर मिलता है। मुहुर्त के विषय में ज्योतिषशास्त्र यह भी कहता है कि कुछ योग ऐसे भी होते हैं जिनमें किये गये काम को पुन: दुहराना पड़ता है। यहां हम इसी प्रकार के कुछ योगों की बात कर रहे हैं। यह योग कैसे बनता है, इस योग का प्रभाव क्या होता है और इन योगों का व्यक्ति के जीवन पर क्या प्रभाव होता है आइये हम मिलकर देखते हैं।
द्विपुष्कर योग (Dwipushkar Yoga)
द्विपुष्कर योग वार, तिथि एवं नक्षत्र के संयोग से बनने वाला ऐसा योग है जिसमें किये गये कार्य की पुनरावृति होती है अर्थात आप जो भी काम करते हैं उसे पुन: दुहराना पड़ता है। ज्योतिषशास्त्र कहता है कि अगर आप इस योग में शुभ काम करते हैं तो आपको दो-बार शुभ काम करने का सौभाग्य प्राप्त होगा (According to the Dwipushkar yoga in astrology you have to repeat work which you are doing )। अगर आप इस योग में कोई अशुभ काम करते है तो, उसे भी आपको दुहराना पड़ता है अत: इस योग में कोई भी अशुभ कार्य नहीं करना चाहिए।
आइये अब देखें कि यह योग किस प्रकार बनता है। भद्रा तिथि(Bhadra Tithi) यानी द्वितीया, सप्तमी, द्वादशी अगर रविवार, मंगलवार अथवा शनिवार के दिन होता है और द्विपाद नक्षत्र यानी मृगशिरा(Mrigshira), चित्रा(Chitra) एवं घनिष्ठा(Ghanishta) में से कोई संयोग करता है तो इन तीनों के मिलाप से यह योग बनता है।
द्विपुष्कर योग"(Dwipushkar yoga) की तरह ही त्रिपुष्कर(Tripushkar yoga) होता है जो किये गये कार्य को तीन बार करवाता है अब हम अपनी बात को इसी योग के साथ आगे बढ़ाते हैं......
त्रिपुष्कर योग (Tripushkar)
त्रिपुष्कर योग का निर्माण भद्रा तिथि यानी द्वितीया, सप्तमी व द्वादशी में होता है जबकि वार हो रविवार, मंगलवार या शनिवार और त्रिपाद नक्षत्र में से कोई यानी कृतिका(kritika), पुनर्वसु(Punarvasu), पू.फा., उ.षा. एवं पू. भाद. आकर संयोग करे। इन तीनों का जब संयोग होता है तब यह योग बनता है। चुंकि इन नक्षत्रों का तीन पैर एक राशि में होता और एक पैर दूसरे में अत: इस योग में किये गये काम को तीन बार करना होता है यह ज्योतिषशास्त्र का मत है। इस योग के रहते आपको कोई भी अशुभ कार्य नहीं करना चाहिए(In the presence of this yog, you should avoid any afspicos) वार, तिथि एवं नक्षत्रों के संयोग से बनने वाले योग त्रिपुष्कर योग के बाद वारी आती है सूर्य, चन्द्र के नक्षत्रों में दूरी से बनने वाले योगों की। इस क्रम में आइये आगे दखे रवि योग को ......
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