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कर्ण-वेध संस्कार (Karan Vedh Sanskar)

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image कर्ण-वेध संस्कार (Karan Vedh Sanskar)

शास्त्रों में वर्णित सोलह संस्कारो को हमारे मनीषियों ने काफी सोच विचार कर तैयार किया है। यहां हम बात कर रहे हैं "कर्णवेधन संस्कार" की इस संस्कार में स्वास्थ्य को आधार बनाया गया है।

"कर्ण वेधन" यानी "कान छेदना" यह संस्कार इसलिए किया जाता है कि ताकि संतान स्वस्थ रहे(This Sanskar is Done For Child Health), उन्हें रोग और व्याधि परेशान न करें। कर्ण वेधन संस्कार कब और किस मुहुर्त में किया जाना चाहिए चलिए जरा इसे देख लें।

समय का आंकलन:(Assessment of Time)
कर्ण वेध के विषय में कहा जाता है कि यह संस्कार बालक के जन्म से दसवें, बारहवें, सोलहवें दिन या छठे, सातवें आठवें महीने में किया जा सकता है। इस संस्कार को नक्षत्र:

कर्णवेध संस्कार के लिए मुहुर्त ज्ञात करते समय यह देखना चाहिए कि नक्षत्र कौन सा है । इस संस्कार के लिए मृगशिरा, रेवती, चित्रा, अनुराधा, हस्त, अश्विनी, पुष्य, अभिजीत, श्रवण, घनिष्ठा और पुनर्वसु अति शुभ माने जाते हैं। इन नक्षत्रों में से किसी भी नक्षत्र में आप यह संस्कार कर सकते हैं।

वार(Day):

वार का विचार करते समय देखना चाहिए कि कर्णवेध के दिन सोमवार, बुधवार, बृहस्पतिवार और शुक्रवार में से कोई वार हो। इन वारों को इस कर्म हेतु शुभ और उत्तम माना गया है।

तिथि(Date):
कर्णवेध संस्कार के लिए चतुर्थ, नवम एवं चतुर्दशी तिथियों एवं अमावस्या तिथि को छोड़कर सभी तिथि शुभ मानी गयी है। आप जब भी अपनी संतान का कर्णवेध करवाएं उस समय ध्यान रखें कि ये तिथि न हो, बाकि किसी भी तिथि में उपरोक्त स्थिति होने पर यह संस्कार सम्पन्न किया जा सकता है।

लग्न(Ascendent):
ज्योतिषशास्त्र में बताया गया है कि वैसे तो सभी लग्न जिसके केन्द्र (प्रथम, चतुर्थ, सप्तम, दशम) एवं त्रिकोण (पंचम, नवम) भाव में शुभ ग्रह हों तथा (तृतीय, षष्टम, एकादश) भाव में पापी ग्रह(Melific planet) हों तो वह लग्न उत्तम कहा जाता है। यहां वृष, तुला, धनु व मीन को विशेष रूप से शुभ माना जाता है। यदि बृहस्पति लग्न में हो तो यह सर्वोत्तम स्थिति कही जाती है।

निषेध: (Nisedh):
कर्णवेध के लिए खर मास(khar Month) यानी (जब सूर्य धनु/ मीन राशि में हो) क्षय तिथि, हरिशयन (Harisayan) (आषाढ़ शुक्ल एकादशी से कार्तिक (kritika) शुक्ल एकादशी (Shukla Ekadashi) तक जन्म मास (चन्द्र मास) सम वर्ष (द्वितीय, चतुर्थ) इत्यादि को कर्ण-वेध संस्कार में त्याज्य किया जाना चाहिए। चन्द्र शुद्धि एवं तारा शुद्धि अवश्य की जानी चाहिए।

गौर करने वाली बात यह है कि बालक शिशु का पहले दाहिना कान फिर बायां कान और कन्या का पहले बायां कान फिर दायां कान छेदना चाहिए यानी कर्णवेधन करना चाहिए।

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