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वेदारम्भ संस्कार(Vedh Arambh Sanskar)

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प्राचीन काल में गुरू शिष्य परम्परा का प्रचलन था। इस समय छात्रों को वेद की शिक्षा दी जाती थी। वेद की शिक्षा छात्रों को आचार्य या गुरू देते थे। भारतीय दर्शन में वेद की जानकारी एवं उनका अध्ययन बहुत ही शुभ माना जाता था। वेदारम्भ संस्कार को उपनयन के साथ किया जाता था(Vedarambh Sanskar was perform with upnayan sanskar) परंतु इसके लिए कोई बाध्यता नहीं थी लोग अलग से भी यह संस्कार करते थे। इस संस्कार के लिए मुहुर्त का विचार करते समय किन किन बातों का ध्यान रखा जाता था चलिए इसे देखते हैं।

नक्षत्र(Nakshatra):

ज्योतिषशास्त्र में वेदारम्भ संस्कार के लिए मुहुर्त का विचार करते समय देखा जाता है कि नक्षत्र कि स्थिति कैसी है। अगर नक्षत्र उत्तराफाल्गुनी, उत्तराषाढ़ा, उत्तराभाद्रपद, रोहिणी, हस्त, अश्विनी, पुष्य, अभिजीत, मृगशिरा, रेवती, चित्रा, अनुराधा या आर्द्रा हैं तो यह शुभ है (As per Muhurta Astrology Uttraphalguni, Rohini, Hast, Pushya, Abhijeet Nakshatras are auspicious for Vedarambha Sanskar)। इनके अलावे जो भी नक्षत्र हैं वे इस संस्कार के लिए शुभ नहीं माने जाते हैं।

तिथि(Date):
संस्कार के लिए शुभ तिथि के रूप में द्वितीया, तृतीया, पंचमी, षष्टी, दशमी, एकादशी और द्वादशी तिथि का नाम लिया जाता है। इन तिथि के साथ जिस दिन उपरोक्त नक्षत्र भी मौजूद हो उस दिन यह संस्कार किया जाता है।

वार(Day):
मुहुर्त ज्ञात करते समय वार का भी काफी महत्व बताया गया है(Day is very important for the Muhurta)। इस संस्कार के लिए जब वार को देखा जाता है तब रविवार, बुधवार, बृहस्पतिवार और शुक्रवार को शुभ वार के रूप में गिनाया जाता है(sunday, Wednesday,Thursday and Friday are Ayspicious days for Vedarambh Sanskar))। इन वारों में से किसी भी वार को यह संस्कार किया जा सकता है।

लग्न(Ascendant):

वेदारम्भ के लिए कोई भी लग्न हो इससे कोई अंतर नहीं होता। ज्योतिषशास्त्र कहता है इस संस्कार के लिए लग्न का बलवान होना बहुत ही आवश्यक है, जब लग्न मजबूत स्थिति में हो आप यह संस्कार कर सकते हैं (Astrology speaks Ascendant should be strong for Vedarambh Sanskar)। जिस लग्न के केन्द्र (प्रथम, चतुर्थ, सप्तम, दशम) तथा त्रिकोण (पंचम, नवम ) भाव में शुभ ग्रह एवं षष्टम, तृतीय एवं एकादश भाव में पाप ग्रह स्थित हों और अष्टम भाव ग्रह रहित हो। इस प्रकार की लग्न स्थिति होने पर वेदारम्भ के लिए बहुत सुन्दर स्थिति कही जाती है।

निषेध(Ban):
ज्योतिषशास्त्र के कथनानुसार वेदारम्भ संस्कार इन स्थितियों में नहीं करना चाहिए जबकि जन्म चन्द्र से गोचरवश चतुर्थ, अष्टम, द्वादश चन्द्र एवं तृतीय, पंचम, सप्तम तारा हो। इस संस्कार के लिए चन्द्रमा और तारा की शुद्धि आवश्यक मानी गयी है(You shouldn't perform Vedarambh Sanskar when the malefic Tara Dosha and Chandra Dosha appear)।

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