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विवाह संस्कार (Vivah Sanskar part II)

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ज्योतिषशास्त्र कहता है किसी भी राशि के अन्तिम नवमांश का त्याग करना चाहिए सिवाय वर्गोत्तम नवमांश के। जब चन्द्रमा तुला या मकर राशि में हो तो चर लग्न और चन्द्र नवमांश का निषेध किया जाना चाहिए। किसी भी राशि का मिथुन, कन्या, तुला, धनु का नवमांश शुभ होता है।

त्रिबल शुद्धि(Accuracy of Tribal):

विवाह के लिए त्रिबल शुद्धि का भी आंकलन आवश्यक होता है (Tribal Sudhhi is important for marriage muhurta)। त्रिबल शुद्धि में सूर्य, चन्द्रमा और बृहस्पति का वर-कन्या की कुण्डली से व्यक्तिगल गोचर का बल देखा जाता है। वर के लिए सूर्य और चन्द्रमा का गोचरवश बल तथा कन्या के लिए चन्द्रमा और बृहस्पति का गोचरवश बल देखा जाता है।

यदि जन्म चन्द्र से सूर्य तृतीय, षष्टम, दशम एवं एकादश भावों में हो तो शुभ होता है (If sun situated in third, sixth, tenth or eleventh house form the brith moon, this is very auspicious in marriage muhurta)। प्रथम, द्वितीय, पंचम, सप्तम, नवम भावों में पूजन के उपरान्त शुभ हो जाता है, परंतु चतुर्थ, अष्टम एवं द्वादश भाव में इसका त्याग करना चाहिए। ज्योतिष के आधार पर इसी प्रकार जन्म चन्द्र से गोचर चन्द्र प्रथम, तृतीय, षष्टम, सप्तम, दशम, एकादश भावों में हो तो शुभ होता है। द्वितीय, पंचम व नवम भावों में पूजा के उपरान्त शुभ हो जाता है तथा चतुर्थ, अष्टम, द्वादश भावों में शुभ नहीं होता है।

ज्योतिषशास्त्र के अनुसार बृहस्पति भी जन्म चन्द्र से गोचरवश द्वितीय, पंचम, सप्तम, नवम, एकादश भावों में हो तो शुभ माना जाता है। प्रथम, तृतीय, षष्टम एवं दशम भाव में पूजन के पश्चात यह शुभ हो जाता है परंतु चतुर्थ, अष्टम व द्वादश भाव में पूर्णत: अनुपयुक्त होता है।

इस प्रकार देखा जाए तो जन्म के चन्द्रमा से तीनों ही ग्रह यदि चतुर्थ, अष्टम, द्वादश भावों में हो तो अशुभ माने जाते हैं (If three Planets is in Fourth,Eighth and Twelveth House form Birth Moon it is very Inauspicious for vivah muhurta)। यदि इन्हीं भावों में उपरोक्त ग्रह स्वराशि या उच्च राशि में हो तो उपरोक्त नियम का उल्लंघन कर शुभ हो जाते हैं। इसी प्रकार यदि ये तीन ग्रह, जन्म चन्द्र से शुभ स्थान में हों परंतु अस्त, नीचस्थ हों तो इनका परिणाम बदल जाता है और इस स्थिति में ये अशुभ होकर त्याग करने योग्य हो जाते हैं।

गोधूलि लग्न(Godhuli Ascendent) :

विवाह मुहुर्त में गोधूलि लग्न को आपातकाल में इस्तेमाल किया जाता है (Godhuli lagna can be used in vivah muhurta)। जब विवाह मुहुर्त में लग्न, नवमांश, तिथि, वार, नक्षत्र इत्यादि के कारण अशुभ परिणाम आ रहा हो तो गोधूलि लग्न ही श्रेष्ठ होता है। सूर्यास्त से 12 मिनट पहले और 12 मिनट बाद का समय (कुल 24 मिनट) गोधूलि लग्न काल होता है। प्राचीन समय में जब गाएं सूर्यास्त के समय जंगल से वापस लौटती थीं तब उनके पैरों की ठोकर से वातावरण में धूल, धुएं की भांति फैल जाती थी, इसलिए उस समय को गोधूलि लग्न कहा गया। परंतु कुछ दोष ऐसे हैं जो गोधूलि लग्न के होने पर भी समाप्त नहीं होते इनमें कुलिका दोष, क्रान्तिसाम्य दोष, नक्षत्र का पाप पीड़ित होना तथा शनिवार का अशुभ दोष इत्यादि। इसी प्रकार चन्द्रमा के प्रथम, षष्टम, अष्टम भाव में होने तथा मंगल के प्रथम, सप्तम, अष्टम भाव में होने का दोष भी यथावत रहता है। इसलिए गोधूलि लग्न का उपयोग तभी करना चाहिए जब कोई अन्य विकल्प न रहे।

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Comments (3 posted):

Makhan Dhurve on 31 December, 2009 12:20:46
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Please Mujhe January & February 2010 me Shubh Vivaah Ki Tithi Bataven. thanks
manojvajpeyee on 19 November, 2010 10:28:49
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mhuyg
manojvajpeyee on 19 November, 2010 10:28:49
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mhuyg

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