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क्या बोलती है प्रश्न कण्डली रोग के विषय में! (Prashna kundali on disease)
मानव शरीर एक जटिल संरचना है, यह यंत्र की भांति कार्य करता है.पृथ्वी, जल, अग्नि,आकाश और वायु इन पंच तत्वों से निर्मित हमारे शरीर पर ग्रहों का प्रभाव पड़ता रहता है.
ब्रह्माण्ड में विचरण करने वाले नक्षत्रों का प्रभाव भी हमारे शरीर पर पड़ता है, जब ग्रह और नक्षत्र शुभ स्थिति (Auspiciouness of planets and nakshatras) में होते हैं तब हमारा शरीर स्वस्थ रहता है, ग्रहों एवं नक्षत्रों की अशुभ दृष्टि (Inauspicious aspects of planets and nakshatras) पड़ने से अथवा इनके कमजोर हो जाने पर हमें कई प्रकार की व्याधियों का सामना करना पड़ता है. ज्योतिषाचार्य कहते हैं कि ग्रह चलायमान होते हैं अत: जीवन में रोगों का आना जाना लगा रहता है.आपकी कण्डली में ग्रह किन स्थितियों से गुजर रहे हैं यह इस संदर्भ में काफी महत्व रखता है.प्रश्न कुण्डली के अनुसार रोग के संदर्भ में बात करें तो इसमें रोग के लिए षष्टम भाव (Sixth house says about disease) से विचार किया जाता है. षष्टम भाव का कारक मंगल ग्रह (Mars is the significator of sixth house) को माना जाता है जो रोग का भी कारक होता है.मंगल के षष्टम भाव में होने पर स्वास्थ्य सम्बन्धी अशुभ परिणाम प्राप्त होता है.मंगल के षष्टम में होने से रोग के कारणों को लेकर अक्सर प्रश्न् उठता है.इस संदर्भ में यहां इस बात पर प्रकाश डालना आवश्यक है कि भारतीय ज्योतिष में सिद्धान्त एवं व्यवहार में अन्तर पाया जाता है.व्यवहार में देखें तो यह माना जाता है कि छठे भाव में शुभ ग्रह की स्थिति या दृष्टि स्वास्थ्य के लिए लाभकारी होती है, इससे रोग का शमन होता है और पाप ग्रहों की दृष्टि या स्थिति रोग में वृद्धि करती है.मंगल को शुभ ग्रह माना गया है फिर छठे भाव में मंगल के होने से रोग का क्या कारण (what is cause behind Mars in the sixth house) है
यह एक गंभीर प्रश्न है.इस प्रश्न का हल जानने के लिए हमें सिद्धान्त को जानना होगा.सिद्धान्त कहता है कि त्रिक भाव (Trika Bhav) (6,8,12) में ग्रह की स्थिति का अर्थ होता है ग्रह के भाव की हानि क्योंकि इसे ज्योतिष में नेष्ट माना गया है.त्रिक भाव में जिस भाव का स्वामी चला जाता है उस भाव की हानि होती है.इन तथ्यों से स्पष्ट होता है कि किस प्रकार भारतीय ज्योतिष में व्यवहार एवं सिद्धान्त में अंतर है. हम रोग भाव का बारीकी से अध्ययन करें तो पाते हैं कि ग्रहों के अतिरिक्त नक्षत्र भी इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं.जब राहु के नक्षत्र आर्दा (Adra nakshatras), स्वाति (Swati) और शतभिषा (Shatavisha) तथा केतु के नक्षत्र अश्वनी (Nakshatra of ketu), मघा (Magha) और मूल (Mula) यदि लग्न/लग्नेश तथा षष्टम भाव / षष्टेष को प्रभावित करें अर्थात उपरोक्त भावों एवं ग्रहों का इन नक्षत्रों से सम्बन्ध स्थापित होने से व्यक्ति गंभीर रोग जैसे कि एड्स, कैंसर से पीड़ित होता है.इस सम्बन्ध में एक बात और ध्यान देने योग्य है कि यदि लग्न/लग्नेश कमजोर स्थिति में हों तो व्यक्ति आसाध्य रोग के कारण मृत्यु को प्राप्त होता है. भारतीय ज्योतिष के अन्य सिद्धान्तों पर गौर करें तो पाते हैं कि एक त्रिक भाव (Trik bhav) का स्वामी दूसरे त्रिक भाव में जाकर विपरीत राजयोग का निर्माण करता है.इस सिद्धान्त के अनुसार यदि षष्टम भाव का स्वामी अष्टम भाव में चला जाये तो रोग का अंत हो जाता है अर्थात इस स्थिति में आप स्वास्थ्य लाभ प्राप्त करते हैं. अष्टम भाव का स्वामी (Lord of eighth house) जब द्वादश भाव (12th house) में पहुंचता है तब आपकी आयु लम्बी होती है.ज्योतिष शास्त्री मानते हैं कि हालांकि सिद्धान्त: ऐसा कहा जाता है परंतु व्यवहार में कदाचित ऐसा नहीं हो पाता है.मंगल से लेकर शनि तक के ग्रह दो-दो राशियों के स्वामी होते हैं, इस स्थिति में यदि उनकी एक राशि त्रिक भाव में पड़ती है तो दूसरी राशि त्रिक स्थान से बाहर,जिससे विपरीत राजयोग (Rajyog) बनता है.विपरीत राजयोग होने के बावजूद जिस भाव में ग्रह की दूसरी राशि होती है उस भाव की हानि होती है.ज्योतिषविद कहते हैं कि रोग के सम्बन्ध में बहुत सोच समझकर तथा बारीकियों पर नज़र रखकर ही फलादेश (Phaladesh) करना चाहिए.
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