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प्राचीन एंव नवीन फलादेश के दृष्टिकोण में अन्तर(भिन्न्ता) (Difference Between Ancient & Modern Attitude of Prediction)
प्राचीन समय में ऋषियो ने फलादेश (Phaladesh) करने के कुछ नियम बनाए थे परन्तु वर्तमान में एसा देखा गया है कि ग्रहो के फल में परिवर्तन आ गया है. फलित ज्योतिष (Phalit Jyotish) में प्राचीन आधार पर की गइ भविष्यवाणियाँ कुछ हद तक गलत साबित हुई है. उदाहरण के लिये सतयुग, द्वापर एंव त्रेतायुग में बृहस्पति ग्रह को बलवान माना जाता था इसका मुख्य कारण यह है कि वह दौर राजतन्त्र का था. बृहस्पति ग्रह राजतन्त्र का कारक है. कलयुग में लोकतान्त्रिक शासन की पद्वति चलती है तथा लोकतन्त्र का ग्रह शनि होने से वर्तमान दौर में शनि ग्रह को सबसे अधिक बलवान माना जाता है.
प्राचीन समय में ऋषियो ने फलादेश (Phaladesh) करने के कुछ नियम बनाए थे परन्तु वर्तमान में एसा देखा गया है कि ग्रहो के फल में परिवर्तन आ गया है. फलित ज्योतिष (Phalit Jyotish) में प्राचीन आधार पर की गइ भविष्यवाणियाँ कुछ हद तक गलत साबित हुई है. उदाहरण के लिये सतयुग, द्वापर एंव त्रेतायुग में बृहस्पति ग्रह को बलवान माना जाता था इसका मुख्य कारण यह है कि वह दौर राजतन्त्र का था. बृहस्पति ग्रह राजतन्त्र का कारक है. कलयुग में लोकतान्त्रिक शासन की पद्वति चलती है तथा लोकतन्त्र का ग्रह शनि होने से वर्तमान दौर में शनि ग्रह को सबसे अधिक बलवान माना जाता है.
सबसे पहले हम ऎसी कुण्डली का विवेचन करेंगे जिसमें बृहस्पति ग्रह बलवान (Exalted Jupiter) होकर बैठा है . ऎसी कुण्डली वाला जातक/जातिका (native) एक उच्च कुल / परिवार (Ucha Kula/ Paribar) में जन्म लेता है या फिर उसके जन्म के पश्चात उसके पैतृक परिवार में समृद्धि आती है. वह उच्च शि़क्षा प्राप्त करता है तथा सरकार व समाज में उच्च पद प्राप्त करता है, परन्तु ऎसा तभी होता है जब उसका लग्नेश (Lord of Ascendant) भी बलवान हो. इस शुभ स्थिति के बावजूद बृहस्पति किसी एक वस्तु विशष (जिस भाव में स्थित है) से व्यक्ति(Native) को वंचित कर देता है, पंचम भाव (5th House) में होने से संतान एंव सप्तम भाव (7th House) में होने से जीवन साथी के सुख में बाधा आ जाती है. उसकी पीडा व्यक्ति हृदय की गहराइयो तक महसूस करता है,ऎसा व्यक्ति शारीरिक परिश्रम करने से बचता है. लेकिन भाग्य में धन का आगमन जारी रहता है. अब हम एक ऎसी कुण्डली पर प्रकाश डालेंगे जिसमें शनि ग्रह (Exalted Saturn)बलवान होकर स्थित है. ऎसी कुण्डली वाले जातक/ जातिका (Native) को बचपन में काफी संघर्ष करना पड्ता है. वह अपने जीवन का निर्माण स्वंय अपने कर्मो से करता है, इसलिए हम उसे कर्मयोगी भी कह सकते हैं. संघर्ष की अग्नि से वह कुन्दन की भाँति तपकर निकलता है, कम उम्र में ही वह काफी अनुभव प्राप्त कर लेता है. जीवन के खट्टे-मीठे अनुभव उसे काफी समझदार बना देते हैं. उसमें करुणा, दया, सेवा एंव न्यायप्रियता कूट-कूट कर भरी होती है. वह जरुरतमन्दो की सहायता करके दानी के रुप में प्रख्यात होता है. छोटे स्तर से परिश्रम करके उच्च स्तर तक पहूँच जाता है. आध्यात्मिक वृत्ति होती है तथा अन्तिम समय सुखपूर्ण व्यतीत होता है.
शनि ग्रह के अतिरिक्त कलयुग में राहु ग्रह बहुत अधिक प्रभाव (Importance of Rahu In KaliYug) रखता है. राहु राजनीति, चतुराइ एंव षडयन्त्रो का कारक ग्रह है. वर्तमान समय में लोगो के व्यवहार में राहू के गुणो की झलक आप देख सकते हैं. समाज में साम-दाम-दण्ड-भेद वाली कपटपूर्ण नीति का विस्तार चारो तरफ देखा जा सकता है. धन एंव सत्ता के आगे रिश्तो की अहमियत समाप्त हो गई है. विश्वास करने पर मनुष्य विश्वासघात करता है. इस तरह का वातावरण राहु ग्रह के प्रभावशाली होने की वजह से है. इस प्रकार से यदि आप प्राचीन दौर और वर्तमान दौर का तुलनात्मक रुप से अध्ययन करेंगे तो पायेंगे कि जहाँ एक ओर शनि ग्रह के उत्तम गुण लोकतन्त्र, समता एंव न्यायकारिता के रुप में समाज को लाभान्वित कर रहे हैं, वही दूसरी ओर राहु ग्रह अपने विषैले गुणो से समाज को प्रदूषित कर रहे है.
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