सूर्य के शुभ योग (Auspicious Yoga of Sun)
कुण्डली का विश्लेषण करते समय ग्रहों के योग पर विशेष रूप से विचार करना चाहिए.ज्योतिषीय विधा के अनुसार जब कोई ग्रह किसी भाव में स्वतंत्र होते हैं तो उनका फल अलग होता है जबकि किसी ग्रह के साथ योग करते हैं तो इनका फल परिवर्तित हो जाता है.
सूर्य ग्रह अन्य ग्रहों के साथ योग बनाकर क्या फल देता है यह ज्योतिषशास्त्र में विशेष महत्व रखता है.
राजराजेश्वर योग (Raj Rajeshwar Yoga)
कुण्डली में सूर्य गुरू की राशि मीन में तथा चन्द्रमा स्वराशि यानी कर्क में होता है तो इस योग का निर्माण होता है.इस योग को ज्योतिषशास्त्र में प्रबल राजयोग कहा गया है.यह योग जिस व्यक्ति की कुण्डली में होता है वह सूर्य के समान स्वाभिमानी एवं उष्मा से भरा तथा चन्दमा की तरह शांतचित्त और कोमल हृदय का स्वामी होता है.यह योग व्यक्ति को बुद्धिमान एवं कल्पनाशील बनता है.अपने व्यक्तित्व के कारण ये सम्मनित व प्रतिष्ठित होते हैं.सरकारी पक्ष से इन्हें अनुकूल सहयोग एवं लाभ मिलता है.यह योग सरकारी नौकरी एवं सरकार से आय भी प्रदान करता है.जिनकी कुण्डली में यह योग बनता है वह धनवान होते हैं एवं सुख प्राप्त करते हैं.
बुधादित्य योग (Budhaditya Yoga)
सूर्य के सबसे नजदीक बुध ग्रह होता है.यह अक्सर सूर्य के साथ ही होता है.कुण्डली में जहां भी यह योग बनता है उस भाव से सम्बन्धित अशुभ प्रभाव को दूर कर देता है.इस योग को राज योग के समान माना गया है.इस योग की युति से व्यक्ति सूर्य के समान साहसी एवं विद्वान होता है.बुद्ध इन्हें बुद्धिमान एवं ज्ञानी बनाता है.इस योग के शुभ प्रभाव से व्यक्ति चतुर
एवं सम्मानित होता है.आर्थिक स्थिति उत्तम रहती है.धन की कमी का सामना नही करना होता है.
भास्कर योग (Bhaskar Yoga)
सू्र्य के अनेक नामों में भास्कर भी एक है.यह योग कुण्डली तब बनता है जबकि बुध सूर्य से द्वतीय भाव में होता है एवं बुध से एकादश भाव में चन्द्रमा और इससे पंचम अथवा नवम में गुरू होता है.ग्रहों का यह योग अति दुर्लभ होता है.जिस व्यक्ति की कुण्डली में यह महान योग बनता है वह व्यक्ति भी महान बन जाता है.इस योग के प्रभाव से धन वैभव से घर भरा होता है.भमि, भवन एवं वाहन का सुख प्राप्त होता है.इनमें कला के प्रति लगाव एवं अन्य लोगों के प्रति स्नेह होता है.
वासी योग (Vasi Yoga)
जन्मपत्री में सूर्य से द्वादश भाव में चन्द्रमा के अलावा कोई भी ग्रह होने पर वासी योग बनता है.यह योग सूर्य से बारहवें भाव में उपस्थित ग्रह के अनुसार शुभ और अशुभ फल देता है.इस भाव में शुभ ग्रह हो तो व्यक्ति बुद्धिमान व ज्ञानी होता है.शुभ वासी योग कार्य कुशल एवं गुणवान बनाता है.यह वाकृपटु एवं चतुर व्यक्तित्व प्रदान करता है.यह योग जिस व्यक्ति की कुण्डली में होता है वह सुखी जीवन का आनन्द लेता है.इस भाव में ग्रह अशुभ होने से स्मरण शक्ति मंद रहती है.हृदय में दया एवं करूणा का अभाव रहता है.घर से दूर रहना होता है और तकलीफ सहना पड़ता है.
वेशि योग (Veshi Yoga)
सूर्य से द्वितीय भाव में चन्दमा के अलावा अन्य ग्रह होने पर वेशि योग बनता है.यह योग इस भाव में उपस्थित शुभ और अशुभ ग्रह के अनुसार अपना फल देता है.अगर ग्रह शुभ होता है तो सुन्दर और आकर्षक व्यक्तित्व प्रदान करता है.वाक्पटु और कुशल नेतृत्वकर्ता बनाता है. इस योग से प्रभावित व्यक्ति राजनीति एवं समाजिक कार्यों में सक्रिय होते है.जनता से इन्हें मान सम्मान मिलता है.अशुभ वेशि योग पाप ग्रहों से निर्मित होता है अत: पाप वेशि योग के नाम से भी जाना जाता है.यह योग जिस व्यक्ति की कुण्डली में उदित होता है उसे नौकरी एवं कारोबार में परेशानियों का भी सामना करना होता है.आर्थिक मामलों में भी इन्हें कष्ट का सामना करना होता है.कार्य और व्यवहार के कारण इन्हें अपमानित भी होना पड़ता है.
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mere kumdli surya ki kya isthi hai yah mujhe janna hai
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