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षड्बल में दिग्बल का महत्व (Importance of Digbala in Shadbala)

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जैसा कि आप जानते हैं किसी भी वस्तु का बल मापने के लिए एक मापक होता है। ज्योतिषशास्त्र में भी ग्रहों का बल मापने के लिए एक मात्रक तैयार किया गया है जिसे षड्बल कहते हैं। षड्बल के अन्तर्गत मुख्यरूप से 6 प्रकार के बल होते हें................

षड्बल के प्रथम बल के विषय मे हम जान चुके हैं आइये अब हम यहां षड्बल के दूसरे मुख्य बल "दिग्बल" की बात करें (Digbala is second important part of Shadbala)। दिग्बल का शाब्दिक अर्थ होता है दिशा का बल (Meaning of Digbala is strength of Direction)। दिग्बल के अन्तर्गत ग्रहों के बल का आंकलन इस आधार पर किया जाता है कि ग्रह किस दिशा में स्थित हैं। ग्रह जिस दिशा में होते हैं उस दिशा में होने से वे कमजोर हो रहे हैं या वे शक्तिशाली हो रहे हैं यह दिग्बल से देखा जाता है और इसी से दिग्बल का मूल्यांकण किया जाता है।

दिग्बल का प्रभाव (Signification of Digbala)
ज्योतिषशास्त्र कहता है कि ग्रहों के बल पर दिग्बल का बड़ा हाथ होता है (As per Astrology Digbala is important for Planets Bala)। जिन ग्रहों का दिग्बल बली होता है वे उन क्षेत्रों में शुभ परिणाम देते हैं जिन विषयों का अधिकार उनके पास होता है (That Planets' Digbala are Powerful they give us good result on their field)। इस प्रकार जिस ग्रह का दिग्बल कमज़ोर होता है वे जिन विषयों के अधिकारी होते हैं उनके सम्बन्ध में नुकसान देते हैं अथवा आपको विभिन्न प्रकार की परेशानियां देते हैं यानी उनके सम्बन्ध में आपको विपरीत प्रभाव मिलता है।

ध्यान देने वाली बात यह है निश्चित तौर पर नहीं कहा जा सकता कि किस दिशा में आपको फल की प्राप्ति होगी क्योंकि ग्रहों की दिशा को लेकर कई प्रकार के विचार देखने को मिलते हैं। ज्योतिषशास्त्र की मानें तो दिग्बल दिशा के बल का स्वरूप होता है। हमें किस दिशा में लाभ मिलेगा या कहें तो कौन सी दिशा हमारे लिए फलदायी होगी यह दिग्बल से आंका जाता है। ज्योतिष सिद्धांत के अनुसार ग्रहों की दिशा के आधार पर दिग्बल का प्रभाव उत्पन्न होता है जैसे सूर्य पूर्व दिशा में, शनि पश्चिम दिशा में, बुध उत्तर दिशा में, मंगल दक्षिण दिशा में, बृहस्पति उत्तर पूर्व में, राहु दक्षिण पश्चिम में, चन्द्रमा उत्तर पश्चिम में, शुक्र उत्तर पूर्व में (According to Astrology Digbala effect is generated from direction of Planets )।

गणना: (Calculation)
कुण्डली के केन्द्रभाव में प्रत्येक ग्रह का दिग्बल होता है (Planets Digbala is Situated in Kendrabhava)। दिग्बल में सूर्य और मंगल दशम भाव में शक्तिशाली होते हैं (In Digbala Sun and Mars are Strong in 10th house)। बृहस्पति और बुध लग्न में हों तो ये बलशाली होते हैं। चन्द्रमा और शुक्र चतुर्थ भाव में व शनि सप्तम भाव में दिग्बली होते हैं।

ज्योतिषशास्त्र का एक अंक अंग है गणितीय ज्योतिष जिसके तहत ग्रहों का दिग्बल निकाला जाता है। इसके अन्तर्गत बताया गया है कि केन्द्र से एक निश्चित दूरी तक ग्रहों का दिग्बल बढ़ता जाता और जैसे ही ग्रह इस सीमा से बाहर जाते हैं उनका दिग्बल शून्य हो जाता है। ग्रहों का अधिकतम बल 60 विरूप होता है। जब ग्रह अपने दिग्बल के केन्द्र से 180 डिग्री से अधिक होने लगता है तो उसे 360 डिग्री से घटाया जाता है जिससे ग्रह का अंक 60 से अधिक नहीं हो।
यहां एक उदाहरण हम देख सकते हैं कि सूर्य जब दक्षिण में या दशम भाव में होता है तो पूर्ण अंक यानी 60 अंक प्राप्त करता है क्योंकि इस समय सूर्य 180 डिग्री पर होता है। लेकिन जब यह घटते क्रम में होता है तो इसका अंक 0 हो जाता है।

दिग्बल ज्ञात करने के लिए गणितिय ज्योतिष मे बताया गया है वह इस प्रकार है।
दिग्बल क्षेत्र = ग्रहों की लम्बाई-  ग्रहों की दुर्बल बिन्दु से घटाया जाता है
(अगर इनके बीच का अंतर 180 से अधिक हो तो इसे 360 डिग्री से घटाया जाता है।)
गहों का दिग्बल ज्ञात करने में आपको परेशानी नहीं हो इसलिए यहां दिये गये गणितिय विधि पर भी आप दृष्टि डाल सकते हैं।
मान लीजिए चन्द्रमा वृषभ राशि में 3 डिग्री पर हो और इसका मेरीडियन प्वांट 17 डिग्री कर्क में हो तो चन्द्र का दिग्बल इस प्रकार होगा।
दिग्बल = (97 डिग्री- 33 डिग्री) /3 = 64/3= 21 अंक।

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