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वैदिक ज्योतिष

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मुख्य अशुभ योग (Main Malefic Yog)

जन्मकुण्डली में ग्रहो की अशुभ स्थिति होने पर एंव उनका आपस में या भाव के साथ सम्बन्ध स्थापित करने पर अशुभ योग (Inauspicious Yog) का निर्माण होता है. मुख्य अशुभ योग इस प्रकार से है.
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जन्मकुण्डली सही होने के बावजूद फलादेश सही क्यों नही होता - एक चिन्तन-1 (Why Wrong Predictions Inspite of Correct Birth Chart)

आजकल प्रायः देखने सुनने मे आता है कि विद्वान ज्योतिर्वेदो या कम्प्यूटर द्वारा बनी सही जन्मकुण्डली का फलादेश (Phaladesh) करने में बडे-बडे विद्वान एंव गणितज्ञ मात खा जाते हैं और फिर स्वंय को सही सिद्ध करने कि लिए कहते हैं कि जन्मकुण्डली गलत बनी है तथा इसमें (Retification of Chart) करने की आवश्यकता है. परन्तु वास्तविकता यह नहीं है, यद्यपि गणित और फलित दोनों ही ज्योतिष के अंग है फिर भी पश्चिमी देशो का गणित वैदिक पद्वति के गणित से उत्तम होने के बावजूद सही फलादेश करने में विफल (Substitute Of Prediction) क्यों है, इसके वास्तविक कारण पर हम प्रकाश डालेंगे. ...
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निराकरण ज्योतिष में सबसे उपयुक्त विधि (Suitable Methods of Remedial Astrology)

वैदिक ज्योतिष के तीन खण्डो में से तृ्तीय खण्ड निराकरण ज्योतिष (Remediaal Astrology) कहलाता है. ज्योतिष के द्वितीय खण्ड फलित ज्योतिष (Phalit Jyotish) से हमें अपने भाग्य के बारे में जानकारी उपलब्ध हो जाती है, परन्तु ग्रहो के अशुभ प्रभाव (Malefic Influence) को दूर करने का साधन निराकरण ज्योतिष के अन्तर्गत आता है. सबसे पहले साधारण ज्योतिषियो द्वारा बताये जाने वाले उपायो की जानकारी दी जायेगी. ...
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फलित ज्योतिष में गण्डमूल नक्षत्रो का प्रभाव (Impact Of Gandamul Nakshatra on Phalit Jyotish)

नक्षत्रो की कुल संख्या (Kula Sankhya of Nakshatra) 27 होती है, जिनमें से 6 नक्षत्र गण्डमूल कहलाते(Six- Gandamula Nakshatra) हैं,...
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ज्योतिष की आड् (नाम पर) में गोरख धन्धा (Enigma In The Name Of Astrology)

ज्योतिष का प्रभाव वैदिक काल (Vedic Kal) से ही रहा है. वैदिक युग में मानव ने ज्योतिष सहित प्रत्येक ज्ञान को आम जन की भलाई के लिए ही प्रयोग किया. कुछ आसुरी प्रवृत्ति के लोगो ने इस ज्ञान का दुरुपयोग किया तो वे राक्षस कहलाये. स्वभाववश सभ मनुष्य सुख-शान्ति एंव आनन्द प्राप्त करना चाहते हैं. इन सबकी प्राप्ति को सुलभ बनाने हेतु ही परमात्मा ने हमें ज्ञान के रुप में सर्वोत्त्म उपहार दिया है. जीवन में तीन चीजें होती हैं:- ...
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अयंनाश (Ayanamsh)

अंग्रेजी सिस्टम में अयंनाश (Ayanamsh) होता है, इसीलिए उसे सायन सिस्टम के रुप में जाना जाता है. भारतीय सिस्टम में अयंनाश (Indian System of Ayanamsh) नही होता इसीलिए उसे निरायण सिस्टम के रुप में जाना जाता है. ये दोनो सिस्टम पूरे विश्व में बहुत ही प्रसिद्ध है. ...
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क्या सूर्य, मंगल, शनि, राहु-केतु अशुभ ग्रह है?(Are Sun, Mars, Saturn, Rahu And Ketu Malefic Planets?)

ज्योतिष ग्रन्थो में नवग्रहो (Nav Grahas) को दो श्रेणियो में बाँटा गया है. शुभ ग्रह जैसे कि चन्द्रमा, बुध, गुरु एंव शुक्र तथा पापी ग्रह (Malefic Planets) सूर्य, मंगल, शनि, राहु और केतु. शुभ ग्रह का अर्थ है, वो ग्रह जो शुभ फल प्रदान करते हैं तथा अशुभ फल देने वाले ग्रह अशुभ् कहलाते हैं. एक प्रश्न जो चिन्तन में उभरता है कि क्या अशुभ् कहे जाने वाले ग्रह सदा हानि ही करते है. और यदि लाभ भी देते हैं तो उनको अशुभ् क्यो कहा जाता है. लेखक ने इस प्रश्न का उत्तर अपने अनुभवो के आधार पर इस आलेख में देने का प्रयास किया है. ...
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क्या ग्रह अस्त होने पर प्रभावहीन हो जाता है? (Does Combustion Influence The Planets)

ज्योतिष शास्त्रो में सामान्य तौर पर ऎसा माना जाता है कि ग्रह अस्त (Combustion of Planets) होने के बाद अपना प्रभाव खो देता है. अर्थात वह निष्फल हो जाता है. तार्किक दृष्टि से तो यह सिद्धान्त सही प्रतीत होता है परन्तु व्यवहारिक दृष्टि से भी क्या यह सही है इसकी विवेचना हम इस लेख के माध्यम से करेंगे. लेखक की मान्यता है कि यदि ग्रह फल देने में एकदम प्रभावहीन हो जाये तो जन्मकुण्डली में उस ग्रह विशेष की उपस्थिति का कोइ अर्थ ही नहीं. कोइ ग्रह अस्त होने पर कमजोर हो सकता है, कडे परिश्रम के उपरान्त फल देगा यह हो सकता है (रुकावटो के पश्चात फल देगा) तथा पूर्ण फल(Purna Phala) न देकर आधा-अधूरा (श्रम के अनुसार)फल प्रदान करेगा. यहाँ एक बात और विशेष रुप से ध्यान देने की है कि यदि अस्त होने वाला ग्रह सूर्य का मित्र हो तो कम हानि और यदि शत्रु हो तो अधिक हानि करेगा. ...
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प्राचीन एंव नवीन फलादेश के दृष्टिकोण में अन्तर(भिन्न्ता) (Difference Between Ancient & Modern Attitude of Prediction)

प्राचीन समय में ऋषियो ने फलादेश (Phaladesh) करने के कुछ नियम बनाए थे परन्तु वर्तमान में एसा देखा गया है कि ग्रहो के फल में परिवर्तन आ गया है. फलित ज्योतिष (Phalit Jyotish) में प्राचीन आधार पर की गइ भविष्यवाणियाँ कुछ हद तक गलत साबित हुई है. उदाहरण के लिये सतयुग, द्वापर एंव त्रेतायुग में बृहस्पति ग्रह को बलवान माना जाता था इसका मुख्य कारण यह है कि वह दौर राजतन्त्र का था. बृहस्पति ग्रह राजतन्त्र का कारक है. कलयुग में लोकतान्त्रिक शासन की पद्वति चलती है तथा लोकतन्त्र का ग्रह शनि होने से वर्तमान दौर में शनि ग्रह को सबसे अधिक बलवान माना जाता है. ...
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भारतीय एंव पाश्चात्य तिथियो में अंतर (Difference Between Indian And Western Tithis)

पाश्चात्य देशो में तिथि का प्रारम्भ रात्रि 12 बजे से होता है. तिथियो की संख्या अधिकतम 31 तक होती है. इनमें से फरवरी का महीना 28/29 दिनों का, जनवरी, मार्च, मई, जुलाई, अगस्त, अक्टूबर, व दिसम्बर के महीने 31 दिनो के तथा अप्रेल, जून, सितम्बर, व नवम्बर 30 दिनो के मास होते हैं. सम्पूर्ण विश्व में इसी कैलेण्डर को प्रामाणिक माना जाता है. सम्पूर्ण विश्व पर अंग्रेजो का साम्राज्य रहने से इस कैलेण्डर वर्ष को मान्यता प्राप्त हुई. ...
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