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भारतीय एंव पाश्चात्य तिथियो में अंतर (Difference Between Indian And Western Tithis)

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image भारतीय एंव पाश्चात्य तिथियो में अंतर (Difference Between Indian And Western Tithis)

पाश्चात्य देशो में तिथि का प्रारम्भ रात्रि 12 बजे से होता है. तिथियो की संख्या अधिकतम 31 तक होती है. इनमें से फरवरी का महीना 28/29 दिनों का, जनवरी, मार्च, मई, जुलाई, अगस्त, अक्टूबर, व दिसम्बर के महीने 31 दिनो के तथा अप्रेल, जून, सितम्बर, व नवम्बर 30 दिनो के मास होते हैं. सम्पूर्ण विश्व में इसी कैलेण्डर को प्रामाणिक माना जाता है. सम्पूर्ण विश्व पर अंग्रेजो का साम्राज्य रहने से इस कैलेण्डर वर्ष को मान्यता प्राप्त हुई.

भारतीय एंव पाश्चात्य तिथियो में अंतर (Difference Between Indian And Western Tithis)पाश्चात्य देशो में तिथि का प्रारम्भ रात्रि 12 बजे से होता है. तिथियो की संख्या अधिकतम 31 तक होती है. इनमें से फरवरी का महीना 28/29 दिनों का, जनवरी, मार्च, मई, जुलाई, अगस्त, अक्टूबर, दिसम्बर के महीने 31 दिनो के तथा अप्रेल, जून, सितम्बर, नवम्बर 30 दिनो के मास होते हैं. सम्पूर्ण विश्व में इसी कैलेण्डर को प्रामाणिक माना जाता है. सम्पूर्ण विश्व पर अंग्रेजो का साम्राज्य रहने से इस कैलेण्डर वर्ष को मान्यता प्राप्त हुई.

जहाँ तक भारतवर्ष का सम्बन्ध है तिथियो (Tithis) के सन्दर्भ में आदिकाल से बहुत प्रयोग हुए हैं. प्राचीन समय तक महीना 27 दिनों का भी होता था. जिसमें दिनों के नाम नक्षत्रो के नाम (Nakshatra Name) से जाने जाते थे. बाद के दिनो में सात दिनो का एक सप्ताह किया गया एंव प्रत्येक दिन ग्रहो के नाम से जाना जाने लगा (सूर्य से लेकर शनि तक) (From Sun to Saturn) जोकि अभी तक जारी है. तथा सम्पूर्ण विश्व में यहि सप्ताह मान्य है. भारत में तिथियों का आधार (Base Of Tithies) चान्द्रमास (Chandra Masa) है जिसमें पन्द्रह-पन्द्र्ह दिनो के दो पक्ष (Pakshya) आते हैं, एक कृष्ण पक्ष (Krishna Pakshya) तथा दूसरा शुक्ल पक्ष (Shukla Pakshya). सूर्य और चन्द्रमा में 13º-20' का अन्तर होने पर एक तिथि का निर्माण होता है. जिसमें कृ्ष्ण पक्ष की तिथियाँ प्रतिपदा (Pratipada) से अमावस्या (Amabasya) तक तथा शुक्ल पक्ष की तिथियाँ प्रतिपदा से पूर्णिमा (Purnima) तक होती है.

परन्तु तिथि का प्रारम्भ रात्रि 12 बजे से होकर सूर्योदय से माना जाता है. यह भी एक आवश्यक शर्त है कि प्रत्येक तिथि में सूर्योदय का स्पर्श अवश्य होना चाहिये. कई बार ऎसा होता है कि कोइ तिथि एक सूर्योदय के पश्चात प्रारम्भ होकर दूसरे दिन सूर्योदय से पहले ही समाप्त हो जाती है तो इस तिथि का क्षय हो जाता है. दूसरी तरफ कोइ तिथि सूर्योदय से पहले प्रारम्भ होकर अगले दिन सूर्योदय तक जारी रहती है तो इस तिथि की वृद्धि हो जाती है. दोनो ही प्रकार की तिथियाँ (तिथि क्षय एंव तिथि वृद्धि) (Tithi Khya & Tithi Bridhi) कर्मकाण्ड (Karmakand) की दृष्टि से शुभ कार्यों के लिए वर्जित मानी जाती है.

भारत में सभी संस्कार अध्यात्म से जुडे हुए हैं. इसलिए प्रत्येक तिथि के देवता (Lord Of Tithi) भी होते है. जहाँ एक तरफ भारत में चन्द्रपक्ष (Chandra Pakshya) पन्द्रह दिनो से कम या ज्यादा हो सकता है वहीं दूसरी ओर पाश्चात्य कैलेण्डर के अनुसार तिथियाँ मास की दृष्टि से स्थिर होती है.

 

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