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साढ़े साती का फेर (All about Shani's Sade Sati)

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image शाढ़े साती का फेर (Period of Sani Sadhe Sati)

आपने देखा होगा शनिवार को काफी संख्या में लोग शनि मंदिर में जाकर तेल, तिल, उड़द आदि शानि देव को भेंट करते हैं एवं दीया जलाते हैं। शनि देव के प्रति इस प्रकार की भक्ति का कारण है अनजाना भय। इस अनजाने भय का नाम है ढईया और साढ़े साती। हम यहां इसी अनजाने भय से रूबरू होते हैं और बात करते हैं साढ़े साती के विषय में.

जब हम साढ़े साती की बात करते हैं तो सबसे पहले हमारे मस्तिष्क में अहम सवाल उठता है कि साढ़े साती आखिर है क्या(What is saadhe sati)? शाब्दिक अर्थ में कहें तो साढ़े साती का अर्थ है साढ़े सात वर्ष। ज्योतिषशास्त्र के नियमानुसार सभी ग्रह गोचरवश एक राशि से दूसरी राशि में भ्रमण करते हैं, शनि ग्रह भी इस नियम का पालन करता है। शनि जब आपके लग्न से बारहवीं राशि में प्रवेश करता है तो उस विशेष राशि से अगली दो राशि में गुजरते हुए अपना समय चक्र पूरा करता है। यह समय चक्र साढ़े सात वर्ष का होता हैं ज्योतिषशास्त्र में इसे ही साढ़े साती के नाम से जाना जाता है।  शनि की गति चुंकि मंद होती है अत: एक राशि को पार करने में इसे ढ़ाई वर्ष का समय लगता है (Saturn takes two and half year to travel across a sign)। उदाहरण के तौर पर देखें तो माना लीजिए आपके लग्न से बारहवीं राशि है मेष है तो इस राशि में जब शनि प्रवेश करेगा तब क्रमश: वृष और मिथुन तीन राशियों से गुजरेगा और अपना समय चक्र पूरा करेगा।

साढ़े साती के शुरू होने को लेकर कई मान्यताएं हैं (There are lots of different views about the beginning of Sade Sati)। प्राचीन मान्यता के अनुसार जिस दिन शनि का गोचर किसी विशेष राशि में होता है उस दिन से शनि की साढ़े साती शुरू हो जाती है। यह मान्यता हलांकि तर्क संगत नहीं है फिर भी प्राचीन होने के कारण व्यवहार में है। इसी संदर्भ में एक मान्यता यह भी है कि शनि गोचर में जन्म राशि से बारहवें राशि में प्रवेश करता है तब साढ़े साती की दशा शुरू हो जाती है और जब शनि जन्म से दूसरे स्थान को पार कर जाता है तब इसकी दशा से मुक्ति मिल जाती है।

तर्क के आधार पर ज्योतिषशास्त्री शनि के आरम्भ और समाप्ति को लेकर एक गणितीय विधि का हवाला देते हैं। इस विधि में साढ़े साती के शुरू होने के समय और समाप्ति के वक्त का ज़ायज़ा लेने के लिए चन्द्रमा के स्पष्ट अंशों की आवश्यकता होती है। चन्द्रमा को इस विधि में केन्द्रबिन्दु मान लिया जाता है। चुंकि साढ़े साती के दौरान शनि तीन राशियों से गुजरता है (Saturn crosses three signs during Sadhe sati) अत: तीनों राशियों के अंशों को जोड़ कर दो भागों में विभाजित कर लिया जाता है। इस प्रक्रिया में चन्द्र से दोनों तरफ 45 अंश 45 अंश की दूरी बनती है। शनि जब  इस अंश के आरम्भ बिन्दु पर पहुचता है तब साढ़े साती का आरम्भ माना जाता है और जब अंतिम सिरे को अर्थात 90 अंश को पार कर जाता है तब इसका अंत माना जाता है।  

शनि की साढ़े साती की शुरूआत को लेकर जहां कई तरह की विचारधाराएं मिलती हैं वहीं इसके प्रभाव को लेकर भी हमारे मन में भ्रम और कपोल कल्पित विचारों का ताना बाना बुना रहता है। लोग यह सोच कर ही घबरा जाते हैं कि शनि की साढ़े साती आज शुरू हो गयी तो आज से भी कष्ट और परेशानियों की शुरूआत होने वाली है। ज्योतिषशास्त्री कहते हैं जो लोग ऐसा सोचते हैं, वे अकारण ही भयभीत होते हैं, वास्तव में अलग अलग राशियों के व्यक्तियों पर शनि का प्रभाव अलग अलग होता है । कुछ व्यक्तियों को साढ़े साती शुरू होने के कुछ समय पहले ही इसके संकेत मिल जाते हैं और साढ़े साती समाप्त होने से पूर्व ही कष्टों से मुक्ति मिल जाती है और कुछ लोगों को देर से शनि का प्रभाव देखने को मिलता है और साढ़े साती समाप्त होन के कुछ समय बाद तक इसके प्रभाव से दो चार होना पड़ता है अत: आपको इस विषय में घबराने की आवश्यकता नहीं है।

अंत में एक छोटी किन्तु महत्वपूर्ण बात यह कहूंगा कि साढ़े साती के संदर्भ में व्यक्ति के जन्म चन्द्र से द्वादश स्थान का विशेष महत्व है। इस स्थान का महत्व अधिक होने का कारण यह है कि द्वादश स्थान चन्द्र रशि से काफी निकट होता है। ज्योतिष परम्परा में द्वादश स्थान से काल पुरूष के पैरों का विश्लेषण किया जाता है तो दूसरी ओर बुद्धि पर भी इसका प्रभाव होता है। शनि के प्रभाव से बुद्धि प्रभावित होती है और हम अपनी सोच व बुद्धि पर नियंत्रण नहीं रख पाते हें जिसके कारण ग़लत कदम उठा लेते हैं और हमें कष्ट व परेशानी से गुजरना होता है। हमें याद रखना चाहिए कि साढ़े साती के दौरान मन और बुद्धि के सभी दरवाजे़ व खिड़कियां खोल देनी चाहिए और शांत चित्त होकर कोई भी काम और निर्णय लेना चाहिए।

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