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शुभ ग्रहों के साथ शनि का सम्बन्ध (Shani and Shubh Grah)
शनि ग्रह ज्यौतिष में अशुभ माना जाता है। यह ग्रह जिस किसी भी भाव में एवं ग्रह के साथ होता है उससे सम्बन्धित विषय में कुछ न कुछ विपरीत प्रभाव डालता है।
शनि जब शुभ ग्रह के साथ होता है तब यह किस प्रकार का फल देता है ज्योतिषीय दृष्टि से आइये इसे देखें।
शनि और चन्द्र का सम्बन्ध (Shani and Chandra)
पितृ दोष मान जाता है। पुनर्जन्म की धारणा पर विश्वास रखने वाले ज्योतिषशास्त्र की मान्यता है कि यह युति किसी व्यक्ति की कुण्डली में तब बनती है जबकि पुर्वजन्म में व्यक्ति अपनी पत्नी का अनादर करता है और उसे कष्ट देता है। इस युति के अशुभ प्रभाव के कारण व्यक्ति को माता की ओर से कष्ट और पररेशानियों को भोगना पड़ता है। माता की ओर से प्राप्त श्राप के कारण व्यक्ति को अपने जीवन में कई प्रकार की समस्याओं और मुश्किलों का सामना करना होता है। इनकी गृहस्थी में भी कलह और कष्टमय स्थिति बनी रहती है। माता की सेवा और आदर करने से उनकी मृत्योपरान्त उनके आशीर्वाद से जीवन में सुख का आगमन होता है।
शनि और गुरू का सम्बन्ध (Shani and Guru)
बृहस्पति देवताओं के गुरू और पूर्णत: सात्विक विचार के शुभ ग्रह हैं। शनि इसके ठीक विपरीत हैं परंतु जब बृहस्पति और गुरू की युति होती है तब शनि अपनी क्रूरता त्याग देता है और व्यक्ति को कष्ट नहीं देता है। शनि गुरू के साथ होने पर शुभ फल देता है परंतु बृहस्पति के हिस्से से जो शुभ फल मिलता है उसमें कमी आ जाती है। बृहस्पति और शनि एक दूसरे को आमने सामने देखें यानी दोनों समसप्तक दृष्टि में हों तब दोनों के गुण बदल जाते हैं। इस स्थिति में शनि बृहस्पति की तरह फल देता है जबकि बृहस्पति शनि के समान कष्ट देने वाला बन जाता है।
प्रथम भाव में शनि जब गुरू के साथ होता है तब यह युति व्यक्ति के लिए बहुत ही उत्तम और शुभफलदायी होती है। इस शुभयोग के प्रभाव से व्यक्ति यश, मान-सम्मान, धन सम्पत्ति प्राप्त करता है। बृहस्पति की शुभता में कमी आने से पिता पक्ष से मिलने वाले सुख में कमी आती है। संतान की ओर से भी चिंता जनक स्थिति रहती है। पंचम भाव में इन दोनों ग्रहों की युति हो तब संतान के सम्बन्ध में अशुभ प्रभाव मिलता है। यह शिक्षा, सुख, कारोबार के सम्बन्ध में अशुभ फल देता है। अष्टम भाव में गुरू और शनि की युति होने पर आर्थिक रूप से परेशानी रहती है परंतु व्यक्ति की आयु लम्बी रहती है। द्वादश भाव में शनि और बृहस्पति की युति शुभ मानी जाती है। इस भाव इनकी युति से व्यक्ति सुख, सौभाग्य एव यश प्राप्त करता है।
शनि और बुध का सम्बन्ध (Shani and Budh)
बुध को शुभ ग्रह माना जाता है परंतु इसे नपुंसक कहा गया है। यह जिसके ग्रह के साथ होता उसी के गुण को अपना लेता है और उसके अनुसार फल देता है। बुध जब बृहस्पति के साथ प्रथम भाव में युति बनाता है तब यह व्यक्ति के व्यक्तित्व में निखार लाता है और व्यक्ति मानवीय गुणों से परिपूर्ण होता है। पंचम एवं दशम भाव में इनकी युति शुभ फलदायक नहीं होती है। द्वादश भाव में दोनों ग्रहों की युति कामयाबी, यश और धन दायक होती है।
शनि और शुक्र का सम्बन्ध (Shani and Shukra)
शनि और शुक्र के मध्य सम्बन्ध समान्यतया शुभ फलदायक होता है। जिस भाव में शनि और शुक्र की युति बनती है उस भाव के फल में वृद्धि होती है। प्रथम भाव में इनकी युति होने पर भौतिक दृष्टि से तो यह शुभ है परंतु पारिवारिक एवं गृहस्थ जीवन के सम्बन्ध में अशुभ फलदायक है। चतुर्थ भाव में इनकी युति होने से स्त्री पक्ष से एवं मित्रों से लाभ होता है। शनि और शुक्र सप्तम भाव में होना चारित्रिक दोष पैदा करता है व्यक्ति का कई स्त्री अथवा पुरूष से सम्बन्ध होता है। यह गृहस्थ जीवन की खुशी में बाधक होता है। जिनकी कुण्डली में शनि और शुक्र दशम भाव में होते हैं उनके लिए यह युति शुभ फल देने वाली होती है।
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