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षड्बल में स्थान बल भाग एक! (Sthan Bala in Shadbala Part-1)
षड्बल में मुख्य छ: प्रकार के बलों से ग्रहों के बल का आंकलन किया जाता है। षड्बल में पहला बल है स्थान बल (Sthan Bala is the first bala in Shadbala)। स्थान बल से किस प्रकार से ग्रहों की शक्ति का आंकलन किया जाता है अर्थात स्थान बल किस प्रकार से षड्बल में सहायक होता है आइये इस पर चर्चा में भाग लें।
स्थान बल जैसा कि नाम से ही ज्ञात होता है इसमें ग्रह किस स्थान पर वर्तमान हैं उसके अनुसार ग्रह के बल का आंकलन किया जाता है। स्थान बल इस बात पर निर्भर करता है कि राशिचक्र में ग्रह किस स्थिति में हैं (Sthana Bala Strength depends on the position of the Planets in the zodiac)। अन्य कारक जैसे ग्रह की गति, भाव कस्प्स (Bhava Cusps) और ग्रहों की दृष्टि इस संदर्भ में गौण मानी जाती हैं (Factors like Speed, Bhava cusps or aspects are not important in Sthana Bala)
ज्योतिषशास्त्र के अनुसार स्थान बल के कुल पांच उपभाग हैं। इन पांच बलों के योग से स्थान बल का निर्माण होता है। ये पांच बल क्रमश: इस प्रकार हैं उच्च बल, सप्तवर्ग बल, दिवा रात्रि बल, केन्द्रादि व द्रेष्कोण बल (Sthana Bala have five sub parts like Uchha Bala, Saptavarga bala, Diva Ratri Bala, Kendradi Bala or Drekkana Bala)। स्थान बल के प्रथम भाग में हम यहां इसके प्रथम दो उपभाग उच्च बल और सप्तवर्ग पर बात कर रहे हैं।
उच्च बल (Uchha Bala)
ग्रहों के बल को मापने का मात्रक रूप होता है। उच्च बल को ग्रहों के मध्य की दूरी व उच्चस्थ बिन्दु को मापने वाला मापक कहा गया है (Uchha Bala is a scale for the distance between a planet and its peak point) । इसके अन्तर्गत उच्चस्थ स्थिति में प्रत्येक ग्रह को 1 रूप और निचस्थ स्थिति में शून्य रूप प्राप्त होता है। औसत मूल्यांकण में अन्य स्थितियों का भी योगदान रहता है। उच्च बल ज्ञात करने के लिए ज्योतिष शास्त्र में जो नियम बताए गये हैं उसके अनुसार किसी भी ग्रह का निचस्थ बिन्दु अधिक से अधिक 180 डिग्री होता हैं और उच्च बल में इस मूल्य का एक तिहाई होता है।
इसे समझने के लिए आइये एक उदाहरण देखते हैं। सूर्य मिथुन राशि में 12 वें भाव में उच्च का है और तुला राशि में 10 वें भाव में नीच का है। इन दोनों के बीच 118 डिग्री की दूरी बन रही है इसलिए उच्च बल 118/3 = 39.3 विरूप है।
सप्तवर्ग बल (Saptavarga Bala)
उच्च बल के बाद आता है सप्तवर्ग बल। सप्तवर्ग बल सात वर्गों का समूह है (Saptavarga bala is collection of Seven varga)। इन सातों वर्गों की गणना समान होती है परंतु इनका मूल्यांकण अलग अलग होता है फिर भी सभी वर्ग का योगदान एक समान माना जाता है। सप्त वर्ग के सातों बलों के नाम हैं राशि, नवमांश, होरा, द्रेष्कोण (Decanate), सप्तमांश, द्वादमांश, त्रयोदमांश (Name of Seven Vargas are Rasi, Navmansha, Hora, Decanate, Saptamamsa, Dwadasamsa and Trimsamsa।
ग्रहों की राशि जिस स्थान पर होती है उसकी शक्ति के अनुसार प्रत्येक वर्ग का योगदान बल आंकलन में होता है। इस विषय को हम एक चार्ट से आसानी से समझ सकते हैं। जो आपकी सुविधा के लिए यहां दिया गया है।
स्थान Placement शक्ति Strength
मूल त्रिकोण (Moolatrikona) 45
अपनी राशि (Own Rasi) 30
आदि मित्र (Adhi Mitra) 20
मित्र (Mitra) 15
सम (Sama) 10
शत्रु (Satru) 4
आदि शत्रु(Adhi Satru) 2
ज्योतिष आंकलन के अनुसार सप्तबर्ग बल का उच्चतम मूल्य 45x7= 315 अंक होता है।
ध्यान देने योग्य बात यह है कि सप्तवर्ग गणना में बल की गणना समान नहीं होती है। उच्चस्थ्य और निचस्थ का सप्तवर्ग बल में विशेष स्थान नहीं होता है।
मूलत्रिकोण की स्थिति की गणना कुण्डली में राशि की स्थति के आधार पर होती है । ग्रहों की आवधिक मित्रता के सम्बन्ध में यहां विभेद पाया जाता है। एक मान्यता के अनुसार आवधिक मित्रता जन्म कुण्डली में ग्रहों की राशि कहां स्थित है इससे देखी जाती है जबकि दूसरी मान्यता के अनुसार यह गणना वर्ग चार्ट जैसे सप्तमवर्ग आदि से की जाती है जिसके विषय में हम विचार कर रहे होते हैं।
स्थान बल के शेष तीन भागों पर विस्तार से जानने के लिए आप स्थान बल भाग दो देख सकते हैं। इसके लिए यहां क्लिक करें।
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