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वर्ष कुण्डली Varsh Kundli
ज्योतिषशास्त्र में वर्ष कुण्डली का महत्व (Importance of Varsh Kundli in Astrology)
भारतीय ज्योतिष विधा में भविष्य फल जानने के लिए जिन पद्धतियों का प्रयोग किया जाता है उनमें वर्ष कुण्डली भी एक है.जिस प्रकार जन्म कुण्डली पूरे जीवन के विषय में फलादेश प्राप्त किया जाता है उसी प्रकार वर्ष कुण्डली साल भर का फल ज्ञात किया जाता है.वर्ष कुण्डली की पद्धति को ताजिक पद्धति के नाम से भी जाना जाता है.
वर्ष कुण्डली ज्ञात करने की विधि (Varsh Kundli Formula)
वर्ष कुण्डली का निर्माण जन्म कुण्डली के आधार पर ही किया जाता है.व्यक्ति के जन्म कुण्डली में सूर्य जितने अंशों पर रहता है उतने ही अंशों पर जिस काल में सूर्य आता है वह वर्ष कुण्डली का प्रवेश समय माना जाता है.इस समय के आधार पर ही जन्म कुण्डली के समान ही वर्ष कुण्डली तैयार की जाती है.
वर्ष कुण्डली और मुथा (Varsh Kundli and Muntha)
वर्ष कुण्डली का एक महत्वपूर्ण अंग है मुंथा.मुंथा के द्वारा वर्ष के अन्तर्गत प्राप्त होने वाले शुभ अशुभ फलों का आंकलन किया जाता है.मुंथा ज्ञात करने के लिए लग्न राशि में व्यक्ति की आयु से एक वर्ष कम जोड़कर 12 से भाग दिया जाता है.इस विधि से जो शेष अंक प्राप्त होता है उस राशि में मुथा होती है.राशियों के अनुसार मुंथा का फल अलग अलग होता है.
वर्ष कुण्डली सहम (Varsh Kundli and Saham)
मुंथा की भांति वर्ष कुण्डली में सहम भी वर्ष के अन्तर्गत होने वाली घटनाओं पर प्रकाश डालने वाला है.ज्योतिषशास्त्री इसकी संख्या अलग अलग बताते हैं, जिनके आधार पर इनकी संख्या 50 से 100 के करीब है.सहम ग्रहों की स्थिति के आधार पर ज्ञात किया जाता है.प्रत्येक सहम को ज्ञात करने का तरीका भी अलग होता है.इसके अन्तर्गत लग्न और ग्रहों के अंशों के माध्यम से सहम की राशि और अंशों का आंकलन किया जाता है.सहम के अंशों से इसके स्वामी को जाना जाता है.सहम के शुभ और अशुभ स्थिति से शुभाशुभ घटनाओं का विचार किया जाता है.
वर्ष कुण्डली के योग (Yoga of Varsh Kundli)
वर्ष कुण्डली में भी जन्म कुण्डली की तरह योग होते हैं, परंतु दानों के योगों में अंतर है.वर्ष कुण्डली में योगों की संख्या 16 है.इन योगों से फलादेश ज्ञात करने में काफी मदद मिलती है.योगों के नाम हैं:- इक्कबाल, इन्दुरवर, इत्यशाल, इसराफ, नक्त, यमया, मणऊ, कम्बूल, गैरी कम्बूल, खल्लासर रद्द, दुफालिकुत्थ, दुत्थकुत्थीर, तम्बीर, कुत्थ, दूरूफ
भारतीय ज्योतिष विधा में भविष्य फल जानने के लिए जिन पद्धतियों का प्रयोग किया जाता है उनमें वर्ष कुण्डली भी एक है.जिस प्रकार जन्म कुण्डली पूरे जीवन के विषय में फलादेश प्राप्त किया जाता है उसी प्रकार वर्ष कुण्डली साल भर का फल ज्ञात किया जाता है.वर्ष कुण्डली की पद्धति को ताजिक पद्धति के नाम से भी जाना जाता है.
वर्ष कुण्डली ज्ञात करने की विधि (Varsh Kundli Formula)
वर्ष कुण्डली का निर्माण जन्म कुण्डली के आधार पर ही किया जाता है.व्यक्ति के जन्म कुण्डली में सूर्य जितने अंशों पर रहता है उतने ही अंशों पर जिस काल में सूर्य आता है वह वर्ष कुण्डली का प्रवेश समय माना जाता है.इस समय के आधार पर ही जन्म कुण्डली के समान ही वर्ष कुण्डली तैयार की जाती है.
वर्ष कुण्डली और मुथा (Varsh Kundli and Muntha)
वर्ष कुण्डली का एक महत्वपूर्ण अंग है मुंथा.मुंथा के द्वारा वर्ष के अन्तर्गत प्राप्त होने वाले शुभ अशुभ फलों का आंकलन किया जाता है.मुंथा ज्ञात करने के लिए लग्न राशि में व्यक्ति की आयु से एक वर्ष कम जोड़कर 12 से भाग दिया जाता है.इस विधि से जो शेष अंक प्राप्त होता है उस राशि में मुथा होती है.राशियों के अनुसार मुंथा का फल अलग अलग होता है.
वर्ष कुण्डली सहम (Varsh Kundli and Saham)
मुंथा की भांति वर्ष कुण्डली में सहम भी वर्ष के अन्तर्गत होने वाली घटनाओं पर प्रकाश डालने वाला है.ज्योतिषशास्त्री इसकी संख्या अलग अलग बताते हैं, जिनके आधार पर इनकी संख्या 50 से 100 के करीब है.सहम ग्रहों की स्थिति के आधार पर ज्ञात किया जाता है.प्रत्येक सहम को ज्ञात करने का तरीका भी अलग होता है.इसके अन्तर्गत लग्न और ग्रहों के अंशों के माध्यम से सहम की राशि और अंशों का आंकलन किया जाता है.सहम के अंशों से इसके स्वामी को जाना जाता है.सहम के शुभ और अशुभ स्थिति से शुभाशुभ घटनाओं का विचार किया जाता है.
वर्ष कुण्डली के योग (Yoga of Varsh Kundli)
वर्ष कुण्डली में भी जन्म कुण्डली की तरह योग होते हैं, परंतु दानों के योगों में अंतर है.वर्ष कुण्डली में योगों की संख्या 16 है.इन योगों से फलादेश ज्ञात करने में काफी मदद मिलती है.योगों के नाम हैं:- इक्कबाल, इन्दुरवर, इत्यशाल, इसराफ, नक्त, यमया, मणऊ, कम्बूल, गैरी कम्बूल, खल्लासर रद्द, दुफालिकुत्थ, दुत्थकुत्थीर, तम्बीर, कुत्थ, दूरूफ




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