ज्योतिष में बृहस्पति ग्रह का महत्व - Jupiter in Astrology



नवग्रहों में बृहस्पति ग्रह सबसे बड़ा और प्रभावशाली माना गया है. बृहस्पति को न केवल ग्रहों में उच्च स्थान प्राप्त है बल्कि यह देवताओं का भी गुरू माना जाता है. गुरू को शुभ ग्रहों के रूप में मान्यता प्राप्त है. ज्योतिषशास्त्र के अनुसार यह धनु और मीन राशि का स्वामी है साथ ही पुनर्वसु, विशाखा और पूर्वाभाद्रपद नक्षत्रों का भी यह स्वामित्व रखता है. गुरू को शुभता, सत्यता, न्याय, सद्गुण व सुख देने वाला गह माना गया है. इस ग्रह को कुण्डली में द्वितीय, पंचम, नवम, दशम एवं एकादश भाव का कारक माना जाता है. यह बारह महीनों में चार महीने वक्री रहता है. बुध और शुक्र से इस ग्रह की शत्रुता है जबकि सूर्य, चन्द्र एवं शनि के साथ इसकी दृष्टि शुभ मानी जाती है. मंगल ग्रह भी बृहस्पति का मित्र ग्रह है.

खगोलीय दृष्टि में बृहस्पति (Jupiter & Astronomy)
खगोल विज्ञान के अनुसार बृहस्पति ग्रह सूर्य से करीब उन्तीस करोड़ छह लाख मील दूर स्थित है जबकि पृथ्वी से करीब अडतीस करोड़ मील दूर स्थित है. इस ग्रह का व्यास नवासी मील है.  बृहस्पति पर दिन हमारी पृथ्वी और मंगल की अपेक्षा छोटा है क्योंकि यह अपने अक्ष पर सिर्फ 9 घंटे 55 मिनट में ही एक चक्र पूरा कर लेता है. यह अस्त होने के एक मास बाद उदित होता, इसके चार मास बाद वक्री और फिर चार महीने बाद मार्गी और फिर सवा चार मास के बाद अस्त हो जाता है. बृहस्पति ग्रह एक राशि में लगभग एक वर्ष रहता है और 12 राशियों का चक्र पूरा करने में लगभग तेरह वर्ष का समय लेता है. वर्तमान में हुए कुछ खोज से पता चला है कि बृहस्पति के पास सबसे अधिक 39 उपग्रह है इस तरह इसने शनि को भी पीछे छोड़ दिया है.

पौराणिक दृष्टि से बृहस्पति (Jupiter & Mythology)
स्कंद पुराण में बताया गया है कि बृहस्पति महर्षि अंगिरा के पुत्र हैं और इन्होंने शिव की कठोर तपस्या प्राप्त कर देव गुरू का पद और ग्रहों में स्थान प्राप्त किया. अपने ज्ञान के बल पर यह देवताओं को यज्ञ भाग दिलाते हैं, यह दयालु हैं, अपने भक्तों को बुद्धि एवं ज्ञान प्रदान कर सद्मार्ग पर ले जाते हैं और सुख व सम्मान दिलाते हैं.

ज्योतिषीय दृष्टि में वृहस्पति (Jupiter & Astrology )
ज्योतिषशास्त्र के अनुसार जो व्यक्ति बृहस्पति से प्रभावित होते हैं वे कफ प्रकृति के होते हैं और वे मोटे होते हैं. इनकी आवाज़ भारी होती है और आंखें एवं बाल भूरे अथवा सुनहरे रंग के होते हैं. बृहस्पति से प्रभावित व्यक्ति धार्मिक, आस्थावान, दर्शनिक, विज्ञान में रूची रखने वाले एवं सत्यनिष्ठ होते हैं.

कुण्डली में बृहस्पति से पंचम, सप्तम और नवम भावों पर इसकी पूर्ण दृष्टि होती है. बृहस्पति की दृष्टि जिन भावों पर होती है उस भाव से सम्बन्धित उत्तम फल की प्राप्ति होती है लेकिन जिस भाव मे यह स्थित होता है उस भाव की हानि होती है. धनु और मीन में यह योगकारक होता है इस स्थिति में होने पर यह जिस भाव में होता है एवं जिन भावों पर दृष्टि डालता है लाभ प्रदान करता है. कन्या एवं मिथुन लग्न वालों के लिए यह बाधक माना जाता है.

हस्त रेखीय ज्योतिष में बृहस्पति: (Jupiter & Palmistry) 
हस्तरेखीय ज्योतिष मे यह गुरू पर्वत के नाम से जाना जाता है. यह पर्वत हथेली में तर्जनी उंगली के नीचे शनि, राहु और मंगल से घिरा होता है. गुरू पर्वत की स्थिति हस्तरेखीय ज्योतिष में काफी महत्वपूर्ण मानी जाती है. इस पर्वत पर वर्ग या वृत्त का चिन्ह होने पर व्यक्ति को साहित्य के क्षेत्र में काफी सफलता मिलती है एवं लक्ष्मी की कृपादृष्टि भी मिलती है. गुरू पर्वत पर इस प्रकार का चिन्ह होना यह भी बताता है कि व्यक्ति काफी महत्वाकांक्षी है. इस पर्वत पर गुणा का चिन्ह बुद्धिमान होने एवं पसंद की कन्या से विवाह को दर्शाता है. गुरू पर्वत पर भाग्य रेखा से निकलकर कोई रेखा पहुंचती है तो भाग्यशाली एवं सम्मान मिलने का संकेत माना जाता है.

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