मेष लग्न में लग्नस्थ ग्रहों का फल (Results for planets located in Aries Ascendant)



मेष लग्न का स्वामी मंगल है.इस लग्न में मंगल लग्नेश और अष्टमेश होता है.गुरू, सूर्य, चन्द्र इस लग्न में कारक ग्रह की भूमिका निभाते हैं (Jupiter, Sun, Moon are the Karakas for this Lagna).बुध, शुक्र और शनि मेष लग्न में अकारक और अशुभ ग्रह का फल देते हैं.

कुण्डली के लग्न भाव में स्थित होकर ग्रह जीवन पर्यन्त व्यक्ति को प्रभावित करते हैं.ग्रह आपको किस प्रकार प्रभावित कर रहे हैं देखिए!

मेष लग्न में लग्नस्थ सूर्य का फल (Results for Sun located in Aries Ascendant)
मेष लग्न की कुण्डली में सूर्य पंचम भाव का स्वामी होता है.त्रिकोण का स्वामी होने से सूर्य इनके लिए शुभ कारक ग्रह होता है.लग्न में सूर्य की उपस्थिति से व्यक्ति दिखने में सुन्दर और आकर्षक होता है.इनमें स्वाभिमान एवं आत्मविश्वास होता है.शिक्षा की स्थिति अच्छी होती है.ये अपनी बातों को कायम रहते हैं.कभी कभी अकारण विवाद में भी उलझ जाते हैं.पिता से सहयोग प्राप्त होता है.जीवन के उत्रार्द्ध में पिता से विवाद होने की भी संभावना रहती है.आर्थिक स्थिति अच्छी होती है.सूर्य अगर पाप ग्रहों से पीड़ित नहीं हो तो सरकार एवं सरकारी पक्ष से लाभ मिलने की संभावना रहती है.सूर्य के प्रभाव से संतान सुख प्राप्त होता है.सूर्य अपनी पूर्ण दृष्टि से सप्तम भाव में स्थित शुक्र की तुला राशि को देखता है.इसके प्रभाव से व्यक्ति को सुन्दर जीवनसाथी प्राप्त होता है.जीवनसाथी से सहयोग प्राप्त होता है परन्तु कभी कभी अनबन होने से गृहस्थ सुख बाधित होता है.

मेष लग्न में लग्नस्थ चन्द्र (Moon in Aries Ascendant)
चन्द्रमा मेष लग्न की कुण्डली में सुखेश होता (Moon is the karaka for happiness in the Aries Ascendant).प्रथम भाव में इसकी स्थिति होने से व्यक्ति शांत प्रकृति का परन्तु चंचल होता है.कल्पनाशील और भोग विलास की इच्छा रखने वाला होता है.इन्हें माता और मातृ पक्ष का सहयोग प्राप्त होता है.भूमि, भवन एवं वाहन सुख प्राप्त होता है.प्रकृति एवं सौन्दर्य के प्रति ये स्वत: आकर्षित होते है.शीत रोग जैसे सर्दी, जुकाम एवं कफ से पीडित होते हैं.छाती सम्बन्धी रोग की भी संभावना रहती है.धन की स्थिति अच्छी होती है.सरकार एवं सरकारी पक्ष से लाभ होता है.सप्तम भाव में स्थित तुला राशि पर चन्द्र की दृष्टि के कारण इनका जीवनसाथी गुणवान, कला प्रेमी और सहयोगी होता है.

मेष लग्न में लग्नस्थ मंगल (Mars in Aries Ascendant)
मेष लग्न की कुण्डली में मंगल लग्नेश और अष्टमेश होता है.लग्नेश होने से मंगल अष्टम भाव के दोष से मुक्त होता है.मंगल लग्नस्थ होने से व्यक्ति हृष्ट पुष्ट स्वस्थ और निरोग होता है.मंगल इन्हे पराक्रमी और साहसी बनाता है.इनमें उग्रता और जिद्दीपन होता है.अपने आत्मबल से कठिन से कठिन कार्य को पूरा करने का सामर्थ्य रखते हैं.समान में सम्मानित और प्रतिष्ठित होते हैं.कमज़ोरों के लिए इनके दृदय मे दया का भाव होता है.धर्म के प्रति आस्थावान होते हैं.मंगल अपनी पूर्ण दृष्टि से चतुर्थ, सप्तम एवं अष्टम भाव को देखता है.इसके कारण भूमि एवं वाहन सुख प्राप्त होता हैं.दुर्घटना की भी संभावना रहती है.जीवनसाथी से वैमनस्य होता है जिसके कारण वैवाहिक जीवन का सुख प्रभावित होता है.अगर मंगल दूषित होता है तो सुख में कमी आती है।

मेष लग्न में लग्नस्थ बुध (Mercury in Aries Ascendant)
बुध मेष लग्न की कुण्डली में अकारक और अशुभ ग्रह होता है.यह इस लग्न की कुण्डली में तृतीय और छठे भाव का स्वामी होता है.बुध जब लग्न में विराजमान होता है तो व्यक्ति को बुद्धिमान एवं ज्ञानी बनता है.शिक्षा के प्रति इनमें अभिरूचि होती है.लेखन एवं कला के क्षेत्र में अच्छी संभावना होती है.बुध की दशावधि में सगे सम्बन्धियो से विवाद अथवा मन मुटाव होता है.षष्ठेश बुध के प्रभाव से पेट सम्बन्धी रोग, मिर्गी, अमाशय जन्य रोग एवं भूलने की बीमारी होने की आशंका रहती है.व्यापार में इन्हें अच्छी सफलता मिलती है.सप्तम भाव पर बुध की दृष्टि संतान के सम्बन्ध में कष्ट देता है.जीवनसाथी के स्वास्थ को प्रभावित करता है.सप्तमस्थ तुला राशि पर बुध की दृष्टि से जीवनसाथी गुणी होता है.वैवाहिक जीवन सामान्य रहता है.

मेष लग्न में लग्नस्थ गुरू (Jupiter in Aries Ascendant)
मेष लग्न की कुण्डली में गुरू भाग्येश और व्ययेश होता है.द्वादश भाव का स्वामी होने से गुरू अकारक और अशुभ फलदायी होता है (Jupiter becomes the lord of the twelfth house and is not favorable) लेकिन त्रिकोण का स्वामी होने से इसका अशुभ प्रभाव दूर हो जाता है और यह शुभ कारक ग्रह बन जाता है.मेष लग्न की कुण्डली में गुरू के लग्नस्थ होने से व्यक्ति विद्वान और ज्ञानी होता है.इनकी वाणी प्रभावशाली और ओजस्वी होती है.गुरू इन्हें समाज में सम्मानित और प्रतिष्ठित बनाता है.लग्नस्थ गुरू पंचम, सप्तम एवं नवम भाव को देखता है.इसके प्रभाव से संतान सुख प्राप्त है.धार्मिक कार्यो में अभिरूचि होती है.शत्रु ग्रह की राशि तुला से दृष्टि सम्बन्ध होने के कारण जीवनसाथी से मन मुटाव रहता है.

मेष लग्न में लग्नस्थ शुक्र (Venus in Aries Ascendant)
शुक्र मेष लग्न की कुण्डली में द्वितीयेश और सप्तमेश होता है.इस लग्न की कुण्डली में यह कष्टकारी और रोगकारक ग्रह की भूमिका निभाता है (Venus becomes malefic and causes suffering and illnesses in Aries ascendant).लग्न में इसकी उपस्थिति होने से व्यक्ति दिखने मे सुन्दर होता है परंतु स्वास्थ सम्बन्धी परेशानियों को लेकर पीड़ित होता है.शुक्र की दशावधि में इन्हें विशेष कष्ट होता है.विपरीत लिंग के व्यक्ति के प्रति इनमें विशेष आकर्षण होता है.इस आकर्षण के कारण इन्हें कष्ट भी होता है.धन की हानि होती है.संगीत एवं कला के क्षेत्र में इनकी अभिरूचि होती है.प्रथमस्थ होकर शुक्र प्रथम भाव में स्वराशि तुला को देखता है जिससे जीवनसाथी सुन्दर और विनोदी स्वभाव का होता है.इनके प्रति प्रेम रखता है परंतु अपनी आदतों के कारण वैवाहिक जीवन का सुख प्रभावित होता है.

मेष लग्न में लग्नस्थ शनि (Saturn in Aries ascendant)
मेष लग्न की कुण्डली में शनि कर्मेश होने से शुभ किन्तु आयेश होने से अशुभ कारक हो जाता है.इस लग्न की कुण्डली में शनि की उपस्थिति होने से व्यक्ति दुबला पतला एवं क्रोधी होता है.ये परिश्रमी होते हैं मेहनत के अनुसार लाभ नहीं मिलने से असंतोष बना रहता है.कार्यो में बाधाओं का सामना करना होता है.धन की स्थिति सामान्य रहती है.लग्नेश शनि तृतीय सप्तम एवं दशम को पूर्ण दृष्टि से देखता है (Lagna lord Saturn has a full aspect on the third, seventh and tenth houses) जिसके कारण मित्रों एवं सगे सम्बन्धियों से अपेक्षित सहयोग मिलने में कठिनाई आती है.नौकरी एवं व्यापार में अस्थिरता बनी रहती है.जीवनसाथी से वैमनस्य होता है.अगर शनि शुभ ग्रह से युत अथवा दृष्ट होता है तो शुभ परिणाम प्राप्त होता है.

मेष लग्न में लग्नस्थ राहु (Rahu in Aries ascendant)
राहु मेष लग्न की कुण्डली में लग्नस्थ होने से व्यक्ति में आत्मविश्वास का अभाव होता है.पेट सम्बन्धी रोग से परेशान होता है.जीवन में काफी संघर्ष करना होता है.नौकरी एवं व्यापार में सफलता के लिए काफी परिश्रम करना होता है.व्यापार की अपेक्षा नौकरी में अधिक सफलता मिलती है.प्रथमस्थ राहु सप्तम भाव में स्थित तुला राशि को देखता है फलत: साझेदारों एवं मित्रो से अपेक्षित सहयोग का अभाव होता है.जीवनसाथी रोग से पीड़ित होता है.गृहस्थ जीवन का सुख प्रभावित होता है.

मेष लग्न में लग्नस्थ केतु (Ketu in Aries Ascendant)
मेष लग्न की कुण्डली में केतु लग्नस्थ होने से व्यक्ति शारीरिक तौर पर शक्तिशाली होता है.आमतौर पर ये स्वस्थ और नीरोग होते हैं.इनमें साहस और आत्मविश्वास होता है जिससे शत्रु वर्ग इनसे भयभीत रहते हैं.समाज में सम्मान एवं यश प्राप्त होता है.राजनीति और कूटनीति में सफल होते हैं.माता एवं मातृ पक्ष से सहयोग प्राप्त होता है.जीवनसाथी एवं संतान पक्ष से कष्ट की अनुभूति होती है.

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