कन्या लग्न में नवग्रहों का फल (Interpretation for placement of planets in Virgo Ascendant)



बुध कन्या राशि का स्वामी है. इस लग्न में जन्म लेने वाला व्यक्ति बुद्धिमान, विवेकशील और व्यवसाय में निपुण होता है. इस लग्न में जिस व्यक्ति का जन्म होता है वे कल्पनाशील और कोमल हृदय के होते हैं. इस लग्न में लग्नस्थ ग्रह का फल अलग अलग होता है जैसे

कन्या लग्न में लग्नस्थ सूर्य (Sun placed in Virgo ascendant)
कन्या लग्न की कुण्डली में सूर्य द्वादशेश होकर सम रहता है (Sun is the lord of the twelfth house and neutral in Virgo ascendant). जिस व्यक्ति की कुण्डली में कन्या लग्न में सूर्य लग्नस्थ होता है वह दिखने में सुन्दर होते है. इनका व्यक्तित्व प्रभावशाली होता है. इन्हें सर्दी, खांसी एवं हृदय से सम्बन्धी रोग होने की संभावना रहती है. सूर्य के प्रभाव से इन्हें विदेश यात्रा के भी कई अवसर प्राप्त होते हैं. लग्नस्थ सू्र्य की दृष्टि सप्तम भाव पर होने से गृहस्थ जीवन के सुख में न्यूनता आती है. कृषि एवं जल क्षेत्र से सम्बन्धित कारोबार इनके लिए लाभप्रद होता है. लग्न में बैठा सूर्य अशुभ ग्रहों से युत अथवा दृष्ट हो तो सूर्य का उपचार करना चाहिए अन्यथा सूर्य का शुभत्व प्रभावित होता है.

कन्या लग्न में लग्नस्थ चन्द्र (Moon placed in Virgo ascendant)
चन्द्रमा कन्या लग्न की कुण्डली में एकादशेश होता है. इस लग्न में यह अकारक ग्रह होता है. लग्नस्थ होने पर चन्द्रमा व्यक्ति को सुन्दर और कल्पनाशील बनाता है. चन्द्रमा के प्रभाव से व्यक्ति दयालु और आत्मविश्वासी होता है. ये अपने जीवन में तीव्र गति से प्रगति करते हैं. सप्तम भाव में स्थित गुरू की राशि पर चन्द्रमा की दृष्टि होने से जीवनसाथी के साथ प्रेमपूर्ण सम्बन्ध रहता है. जीवनसाथी से अपेक्षित सहयोग भी प्राप्त होता है. इन्हें अचानक लाभ मिलता है. अगर लग्नस्थ चन्द्र अशुभ ग्रह से दृष्ट अथवा युत होता है तो कष्टकारी एवं पीड़ादायक होता है.

कन्या लग्न मे लग्नस्थ मंगल (Mars placed in Virgo ascendant)
मंगल कन्या लग्न की कुण्डली में तृतीयेश और अष्टमेश होकर अकारक ग्रह की भूमिका निभाता है. मंगल कन्या लग्न में लग्नस्थ होकर व्यक्ति को क्रोधी और उग्र बनाता है. चतुर्थ भाव पर मंगल की दृष्टि भाईयों से अनुकूल सम्बन्ध बनाता है (The aspect of Mars on the fourth house gives good relationships with siblings) दूसरी ओर माता पिता से मतभेद पैदा करता है. प्रथम भाव में स्थित मंगल पिता को स्वास्थ्य सम्बन्धी पीड़ा देता है. अष्टम भाव पर मंगल की दृष्टि होने से शारीरिक कष्ट की संभावना रहती है. गृहस्थी के लिए मंगल की यह स्थिति शुभकारी नहीं रहती। लग्नस्थ मंगल सप्तम भाव के फल को पीड़ित करता है. साझेदारो से इन्हें धोखा मिलने की संभावना रहती है.

कन्या लग्न में लग्नस्थ बुध (Mercury placed in Virgo ascendant)
बुध कन्या लग्न की कुण्डली में लग्नेश और कर्मेश होकर प्रमुख कारक ग्रह होता है. लग्नेश के स्वराशि में स्थित होने से व्यक्ति स्वस्थ सुन्दर और आकर्षक होता है (Mercury in its own house makes the person attractive). बुध व्यक्ति को दीर्घायु बनता है. लग्नेश बुध के प्रभाव से व्यक्ति आत्मविश्वास से परिपूर्ण होता है. अपने आत्मबल से व्यवसाय एवं कारोबार में निरन्तर प्रगति करता है. इन्हें समाज से सम्मान और आदर प्राप्त होता है. प्रथम भाव में स्थित बुध सप्तम भाव को अपनी पूर्ण दृष्टि से देखता है. बुध की दृष्टि से सुयोग्य जीवनसाथी प्राप्त होता है. गृहस्थ जीवन खुशहाल और आनन्दमय रहता है.

कन्या लग्न में लग्नस्थ गुरू (Jupiter placed in Virgo ascendant)
कन्या लग्न की कुण्डली में गुरू अकारक ग्रह होता है. यह चतुर्थ और सप्तम भाव का स्वामी होता है. गुरू के लग्नस्थ होने से व्यक्ति को अपने जीवन में पिता के नाम से पहचान मिलती है. सगे सम्बन्धियों से अनबन रहती है. पुत्रों से आदर और सहयोग प्राप्त होता है. पैतृक सम्पत्ति से इन्हें लाभ मिलता है. प्रथम भाव में स्थित गुरू पंचम, सप्तम एवं नवम भाव को देखता है. गुरू की दृष्टि से व्यक्ति दीर्घायु, पुत्रवान और विख्यात होता है. गुरू अशुभ ग्रहों से युत अथवा दृष्ट होता है तो संतान के लिए कष्टकारी होता है.

कन्या लग्न में लग्नस्थ शुक्र (Venus placed in Virgo ascendant)
शुक्र कन्या लग्न की कुण्डली में धनेश और भाग्येश होकर कारक ग्रह होता है (Venus becomes the Bhagyesh and Dhanesh in Libra Kundali). लग्न में कन्या राशि में बैठा शुक्र व्यक्ति को जीवन में प्रगति की राह पर आगे ले जाता है. शुक्र के प्रभाव से व्यक्ति संगीत अथवा कला के अन्य क्षेत्रों में रूचि रखता है. इनमें धार्मिक भावनाओं का समावेश होता है. इन्हें व्यवसाय में अच्छी सफलता मिलती है. सरकार एवं सरकारी विभाग से इन्हें सहयोग प्राप्त होता है. लग्नस्थ शुक्र की दृष्टि सप्तम भाव पर होने से जीवनसाथी सुयोग्य और सहयोगी प्राप्त होता है. शुक्र अशुभ ग्रहों से युत अथवा दृष्ट होने पर शुक्र का शुभत्व प्रभावित होता है .

कन्या लग्न में लग्नस्थ शनि (Saturn placed in Virgo ascendant)
कन्या लग्न की कुण्डली में शनि सम होता है. इस लग्न में यह पंचमेश व षष्ठेश होता है (In Virgo ascendant Saturn becomes the lord of the fifth and the sixth house). शनि के प्रभाव से व्यक्ति शारीरिक तौर पर मजबूत होता है. कठिन परिश्रम करने में ये पीछे नहीं रहते. ज्ञान एवं बुद्धिमता में भी ये आगे होते हैं. इनका पारिवारिक जीवन अशांत रहता है. संतान से सहयोगात्मक सम्बन्ध नहीं रहता. प्रथमस्थ शनि तृतीय, सप्तम एवं दशम भाव को देखता है जिससे संतान के विषय में इन्हें कष्ट का सामना करना होता है. जीवनसाथी देखने में सुन्दर और आध्यात्मिक विचारों वाला होता है. परंतु स्वभाव से जिद्दी और क्रोधी होता है. गृहस्थ जीवन में इससे कभी कभी परेशानियों का भी सामना करना होता है.

कन्या लग्न मे लग्नस्थ राहु (Rahu placed in Virgo ascendant)
राहु कन्या लग्न में प्रथम भाव में स्थित होने से व्यक्ति लम्बा और सुडौल दिखता है. इनमें चतुराई और स्वार्थ की भावना रहती है. अपना काम किसी भी प्रकार से निकाल लेते हैं. स्त्री की कुण्डली में सप्तम भाव पर राहु की दृष्टि होने से संतान के सम्बन्ध मे कष्टकारी होता है. राहु की यह दृष्टि जीवनसाथी को पीड़ित करता है. पारिवारिक जीवन को अशांत और कलहपूर्ण बनाता है.

कन्या लग्न में लग्नस्थ केतु (Ketu placed in Virgo ascendant)
प्रथम भाव मे कन्या लग्न में स्थित केतु व्यक्ति को स्वार्थी बनाता है. इससे प्रभावित व्यक्ति में स्वाभिमान की कमी रहती है. गुप्तचरी एवं जासूसी के काम में इन्हें सफलता मिलती है. इन्हें वात रोग होने की संभावना रहती है. कमर में भी इन्हें पीड़ा रहती है. सप्तम भाव केतु से दृष्ट होने के कारण इस भाव से सम्बन्धित फल पीड़ित होता है. यह जीवनसाथी को रोगग्रस्त करता है. सप्तम भाव शुभ ग्रह से युक्त अथवा दृष्ट नहीं होने से  विवाहेत्तर सम्बन्ध की भी संभावना रहती है.

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