धनु लग्न में लग्नस्थ ग्रहों का फल (Predictions for planets in Sagittarius)



धनु लग्न का स्वामी गुरू है (Jupiter is the lord of Sagittarius Rashi).  इस लग्न में जिनका जन्म होता है वे मानवीय गुणों से परिपूर्ण होते हैं.

दूसरों के प्रति दया का भाव रखते हैं.  सादगी पसंद करते हैं.  ईश्वर के प्रति आस्थावान और भाग्यशाली होते हैं.  इस लग्न में आपका जन्म हुआ है तो यह देखिए कि लग्न में स्थित ग्रह आपको किस प्रकार से प्रभावित कर रहे हैं.

धनु लग्न में लग्नस्थ सूर्य (Sun in Sagittarius Ascendant)
धनु लग्न की कुण्डली में सूर्य भाग्येश होता है (Sun is the lord of fortune in a kundali of Sagittarius Ascendant).  यह अगर लग्न में विराजमान होता है तो व्यक्ति को स्वस्थ और सुन्दर शरीर देता है.  ज्ञान, बुद्धि एवं आत्मबल प्रदान करता है.  वाणी प्रभावशाली और आकर्षित करने वाली होती है.  व्यापार एवं नौकरी दोनों ही इनके लिए लाभप्रद होता है परंतु नौकरी में विशेष सफलता मिलती है.  लेखन, वाचन एवं बौद्धिक कार्यो में लोकप्रियता प्राप्त करते हैं.  चित्रकला व शिल्पकला में इनकी अभिरूचि होती है.  लग्नस्थ सूर्य सप्तम भाव में बुध की राशि मिथुन को देखता है (Sun aspects the seventh house from the ascendant).  सूर्य की दृष्टि फल से धन, यश और मित्रों से सहयोग प्राप्त होता है.  आर्थिक स्थिति अच्छी रहती है.  भाग्येश सूर्य सरकारी क्षेत्र से लाभ दिलाता है.  जीवनसाथी एवं संतान सुख प्राप्त होता है.

धनु लग्न में लग्नस्थ चन्द्र (Moon placed in Sagittarius ascendant)
चन्द्रमा धनु लग्न की कुण्डली में अष्टमेश होने पर भी समफलदायी होता है.  यह अगर लग्न में स्थित होता है तो व्यक्ति का मन अस्थिर रहता है.  अनुसंधानात्मक कार्यों में इनकी रूचि रहती है.  लग्नस्थ चन्द्र के कारण व्यक्ति को स्वास्थ्य सम्बन्धी परेशानियों का सामना करना होता है.  व्यक्ति यात्रा का शौकीन होता है.  इन्हें प्राकृतिक दृष्य एवं जल क्षेत्र प्रिय होता है.  कला के विभिन्न क्षेत्रों में एवं लेखन में इनकी अभिरूचि होती है.  इन विषयों में इन्हें सफलता और कामयाबी भी जल्दी मिलती है.  चन्द्र की दृष्टि सप्तम भाव में सिंह राशि पर होती है जो इसकी मित्र राशि है फलत: सुन्दर और सुयोग्य जीवनसाथी प्राप्त होता है.  संतान सुख विलम्ब से प्राप्त होता है.

धनु लग्न में लग्नस्थ मंगल (Mars placed in Sagittarius ascendant)
मंगल धनु लग्न की कुण्डली में पंचमेश और द्वादशेश होकर शुभ कारक ग्रह होता है (Mars is the lord of the fifth and the twelfth houses when placed in a kundali of Sagittarius ascendant).  मंगल गुरू की राशि धनु में लग्नस्थ होने से शिक्षा के मार्ग में अवरोध पैदा करता है.  विपरीत लिंग के प्रति लगाव पैदा करता है.  मंगल इन्हें परिश्रमी बनाता है.  व्यक्ति अपनी मेहनत और क्षमता से धन अर्जित करता है.  प्रथमस्थ मंगल चतुर्थ, सप्तम एवं अष्टम भाव को देखता है. इसकी दृष्टि से गृहस्थ जीवन में पति पत्नी के मध्य वैमनस्य होता है, यदा कदा विवाद भी उत्पन्न होता है.

धनु लग्न मे लग्नस्थ बुध (Mercury in Sagittarius)
बुध धनु लग्न की कुण्डली में सप्तम और दशम दो केन्द्र भाव का स्वामी होता है.  दो केन्द्रभाव का स्वामी होने से यह अकारक ग्रह बन जाता है (Mercury becomes a malefic influence because of dual lordship of Kendra houses).  परंतु बुध लग्नस्थ होने से व्यक्ति को सुन्दर और नीरोग का काया प्रदान करता है.  माता पिता से स्नेह और सहयोग प्रदान करता है.  सरकार एवं सरकारी विभाग से लाभ एवं सम्मान दिलाता है.  ससुराल पक्ष से इन्हें समय पर लाभ मिलता है.  बुध सप्तम भाव में स्थित स्वराशि को देखता है जिससे जीवनसाथी सुन्दर और सहयोगी प्राप्त होता है.  मित्रों एवं साझेदारों से लाभ प्राप्त होता है.  व्यापार में लाभ मिलता है.  आर्थिक स्थिति मजबूत रहती है.

धनु लग्न में लग्नस्थ गुरू  (Jupiter in Sagittarius Ascendant)
गुरू धनु लग्न की कुण्डली में लग्नेश और चतुर्थेश होता है। कुण्डली में गुरू जब स्वराशि धनु में लग्नस्थ होता है तो व्यक्ति को सुन्दर और स्वस्थ काया प्रदान करता है (Guru in own sign gives a person an attractive appearance)। व्यक्ति बुद्धिमान और ज्ञानी होता है। समाज में मान सम्मान और प्रतिष्ठा प्राप्त करता है। भूमि, भवन एवं वाहन सुख प्राप्त होता है। प्रथम भावस्थ गुरू की पूर्ण दृष्टि पंचम भाव में मेष राशि पर, सप्तम में मिथुन पर और नवम भाव में सिंह राशि पर होती है। गुरू की दृष्टि फल से व्यक्ति साहसी और उदार होता है। जीवनसाथी और संतान से सुख प्राप्त करता है। जीवन ऐश्वर्य और सुख से परिपूर्ण होता है। नौकरी एवं कारोबार में सफलता मिलती है। शत्रुओं का भय होता है परंतु वे अहित नहीं कर पाते।

धनु लग्न में लग्नस्थ शुक्र (Venus in Sagittarius Ascendant)
धनु लग्न की कुण्डली में शुक्र अकारक और अशुभ ग्रह होता है। यह इस लग्न की कुण्डली में छठे और ग्यारहवें भाव का स्वामी होता है (Venus is the lord of the sixth and the eleventh house when placed in Sagittarius ascendant)। शुक्र धनु लग्न में लग्नस्थ होने से व्यक्ति दिखने में सुन्दर होता है परंतु शुक्र के षष्ठेश होने से व्यक्ति को स्वास्थ्य सम्बन्धी परेशानियों का सामना करना होता है। शुक्र एकादशेश होने से आर्थिक स्थिति सुदृढ़ बनता है। राजकीय क्षेत्र से लाभ प्रदान करता है। शुक्र के प्रभाव से इन्हें सरकारी नौकरी मिलने की संभावना भी प्रबल रहती है। संगीत एवं कला के प्रति लगाव रहता है। शुक्र सप्तम भाव में मित्र ग्रह बुध की राशि मिथुन को पूर्ण दृष्टि से देखता है फलत: इनका जीवनसाथी सुन्दर और सहयोगी होता है। गृहस्थ जीवन सुखमय रहता है।

धनु लग्न में लग्नस्थ शनि (Saturn in Sagittarius ascendant)
शनि धनु लग्न की कुण्डली में द्वितीय और तृतीय भाव का स्वामी होता है। इस लग्न में शनि लग्नस्थ होने से व्यक्ति दुबला पतला होता है (Saturn has a malefic impact when placed in Sagittarius ascendant)। शनि के प्रभाव से व्यक्ति नेत्र रोग से पीड़ित होता है। इन्हें स्वतंत्र निर्णय लेने में कठिनाई होती है। जीवन में प्रगति हेतु दूसरों से सलाह एवं सहयोग इनके लिए अपेक्षित होता है। धन संचय की प्रवृति होती है। शेयर, सट्टा एवं लांटरी से इन्हें कभी कभी अचानक लाभ मिलता है। लग्नस्थ शनि तृतीय भाव में कुम्भ राशि को, सप्तम भाव मे मिथुन राशि को एवं दशम भाव में बुध की राशि कन्या को देखता है।

इन भावों में शनि की दृष्टि होने से मित्रों से अपेक्षित लाभ और सहयोग नहीं मिल पाता है। साझेदारों से हानि होती है। दाम्पत्य जीवन में कष्ट की अनुभूति होती है।

धनु लग्न लग्नस्थ राहु (Rahu in Sagittarius ascendant)
धनु लग्न की कुण्डली में राहु लग्नस्थ होने से व्यक्ति लम्बा और हृष्ट पुष्ट होता है। इनकी बुद्धि कुटनीतिक होती है। अपना कार्य किसी भी तरह निकालना जानते हैं। (When Rahu is placed in the Sagittarius ascendant, the person knows how to manipulate things for his advantage) स्वहित सर्वोपरि इनका सिद्धान्त होता है। राहु की दृष्टि से संतान सुख में बाधा और जीवनसाथी से सहयोग मिलने की संभावना कम रहती है। जीवनसाथी स्वास्थ्य के कारण परेशान होता है।

धनु लग्न में लग्नस्थ केतु (Ketu in Sagittarius ascendant)
केतु की उपस्थिति धनु लग्न की कुण्डली में प्रथम भाव में होने से व्यक्ति के स्वास्थ में उतार चढाव होता रहता है। कमर और जोड़ों में दर्द रहता है। आत्मबल का अभाव होने से किसी महत्वपूर्ण विषयों पर निर्णय लेने कठिनाई महसूस करते हैं। व्यापार की अपेक्षा नौकरी करना इन्हें पसंद होता है। रहस्यमयी चीज़ों में इनकी रूचि रहती है।

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